Aadivasi Bunaai को मिला नया बाजार, ‘पंचा’ धोती के रूप में पेश हुई संताली हस्तकला
संताली Tribal Weaving को आधुनिक बाजार से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। रामराज कॉटन ने ओडिशा के मयूरभंज की पारंपरिक संताली हस्तकरघा कला से प्रेरित ‘पंचा’ धोती लॉन्च की है । इस पहल के तहत जनजातीय समुदाय की पारंपरिक Tribal Weaving को आधुनिक धोती के रूप में बाजार तक पहुंचाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य कम प्रचलित हस्तकरघा परंपराओं को नई पहचान देना है ।
विषय सूची
- Tribal Weaving की पारंपरिक कला का पुनर्जागरण
- ‘पंचा’ धोती की खासियत
- 800 महिला बुनकरों की आर्थिक आजादी
- Tribal Weaving के पीछे की प्रेरणादायक कहानी
- आधुनिक बाजार में संताली Tribal Weaving का भविष्य
1. Tribal Weaving की पारंपरिक कला का पुनर्जागरण
संताली Tribal Weaving सदियों पुरानी एक समृद्ध परंपरा है, जो पारंपरिक रूप से संताली समुदाय की महिलाओं द्वारा साड़ियों के रूप में बुनी जाती थी । हालांकि, बदलती जीवनशैली, घटती मांग और सीमित बाजार पहुंच के कारण यह Tribal Weaving धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही थी ।
रामराज कॉटन के संस्थापक और अध्यक्ष के.आर. नागराजन ने इस Tribal Weaving के कलात्मक मूल्य को पहचाना और इसे धोती के रूप में पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया । यह पहल न केवल Tribal Weaving को नई पहचान देती है, बल्कि उन महिला बुनकरों के लिए आजीविका के नए अवसर भी पैदा करती है जो इस कला को जीवित रखे हुए हैं ।
2. ‘पंचा’ धोती की खासियत
‘पंचा’ धोती 100 प्रतिशत सूती कपड़े से हाथ से बुनी गई है, जिसमें ऑफ-व्हाइट बेस और एज़ो-फ्री रंगों का उपयोग किया गया है । इस Tribal Weaving की विशेषता एक्स्ट्रा-वेफ्ट तकनीक है, जो कपड़े पर एक विशिष्ट रिब पैटर्न बनाती है ।
इस Tribal Weaving को पारंपरिक साड़ियों की तुलना में धोती पर उतारना एक अनोखा प्रयोग है, क्योंकि धोती परंपरागत रूप से दक्षिण भारत से जुड़ा एक वस्त्र है, जबकि संताली Tribal Weaving ओडिशा के जंगलों और दूरदराज के इलाकों से उत्पन्न होती है ।
इस लिमिटेड एडिशन में 11 अलग-अलग डिज़ाइन वाली आठ गज की धोतियां शामिल हैं । ‘पंचा’ धोती की कीमत ₹3,999 रखी गई है ।
3. 800 महिला बुनकरों की आर्थिक आजादी
इस Tribal Weaving पुनरुद्धार पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसने मयूरभंज की 800 से अधिक महिला बुनकरों के जीवन में बदलाव लाया है । मौन ध्वनि फाउंडेशन के सहयोग से इन महिलाओं को प्रशिक्षण, कच्चा माल और बाजार उपलब्ध कराया गया है ।
ये महिलाएं कपास की खेती से लेकर धागा बनाने, रंगाई और बुनाई तक का पूरा काम खुद करती हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इन संताली Tribal Weaving महिला बुनकरों की सराहना की थी ।
4. Tribal Weaving के पीछे की प्रेरणादायक कहानी
इस Tribal Weaving के पुनरुद्धार की कहानी काफी दिलचस्प है। मौन ध्वनि फाउंडेशन की संस्थापक बिंदु विनोदन ने ऑक्सफोर्ड से पढ़ाई के बाद अपनी नौकरी छोड़ी और इस Tribal Weaving को पुनर्जीवित करने के लिए मयूरभंज के दूरदराज के गांवों में काम शुरू किया ।
शुरुआत में उन्हें संताली Tribal Weaving का कोई नमूना नहीं मिल पाया, क्योंकि संताली समुदाय में परंपरागत रूप से लोगों को उनके कपड़ों के साथ दफनाया जाता था । आखिरकार एक पुराने संदूक में बंद एक पुरानी साड़ी मिली, जिसने इस Tribal Weaving की बुनियादी तकनीक सीखने में मदद की ।
5. आधुनिक बाजार में संताली Tribal Weaving का भविष्य
रामराज कॉटन की यह पहल संताली Tribal Weaving को एक नया बाजार प्रदान करती है। यह ‘पंचा’ धोती कंपनी के चुनिंदा स्टोर और ऑनलाइन माध्यम से 7 अगस्त से उपलब्ध होगी ।
के.आर. नागराजन का मानना है कि युवा पीढ़ी लगातार कुछ नया खोज रही है और ये डिज़ाइन उनके बीच काफी लोकप्रिय होंगे । हालांकि, वह यह भी मानते हैं कि जो लोग पारंपरिक सफेद धोती के आदी हैं, उन्हें इस नए Tribal Weaving से जुड़ी धोती को अपनाने में समय लग सकता है ।
इस पहल से मयूरभंज की संताली Tribal Weaving को व्यापक पहचान मिलेगी और पारंपरिक हस्तकरघा कला को नए बाजार से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त होगा। यह दिखाता है कि कैसे परंपरा और नवाचार का मिलन एक लुप्त होती कला को नई जीवन दे सकता है ।
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