
Sharad Purnima 2026: मिथिला में कोजगरा, बंगाल में कोजागरी—एक पूर्णिमा, कई परंपराएं
Sharad Purnima 2026: One Full Moon, Many Traditions—from Mithila’s Kojagara to Bengal’s Kojagari
आश्विन मास की पूर्णिमा देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। कहीं इसे Sharad Purnima 2026, कहीं कोजागरी लक्ष्मी पूजा, मिथिला में कोजगरा, महाराष्ट्र में कोजागिरी पूर्णिमा, तो ओडिशा में कुमार पूर्णिमा कहा जाता है। वर्ष 2026 में पूर्णिमा की मुख्य रात रविवार, 25 अक्टूबर को है। पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को शुरू होकर 26 अक्टूबर की सुबह तक रहने की जानकारी पंचांगों में दी गई है। स्थानीय पूजा-विधि और समय के लिए अपने क्षेत्र का पंचांग देखना उचित होगा।
मिथिला में नवविवाहित वर के घर होता है कोजगरा
मिथिलांचल में कोजगरा का विशेष संबंध नवविवाहित वर से है। विवाह के बाद आने वाली आश्विन पूर्णिमा पर वर के घर उत्सव का माहौल रहता है। परंपरा के अनुसार, वधू पक्ष की ओर से पान, मखाना, मिठाई और अन्य उपहार भेजे जाते हैं। परिवार और समुदाय के लोग एकत्र होते हैं; कई जगह वर का चुमौन किया जाता है और आए हुए लोगों के बीच पान-मखाना बांटा जाता है। रस्मों का स्वरूप परिवार और स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है। आकाशवाणी की रिपोर्ट में भी मिथिलांचल में कोजगरा, नवविवाहित वर और पान-मखाना बांटने की परंपरा का उल्लेख है।
बंगाल में मां लक्ष्मी की आराधना और रातभर जागरण
पश्चिम बंगाल में इस Sharad Purnima 2026 को कोजागरी लक्ष्मी पूजा के रूप में मनाया जाता है। घरों की सफाई और सजावट के बाद अल्पना बनाई जाती है, दीप जलाए जाते हैं और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। कई परिवारों में लक्ष्मी पंचाली का पाठ और विशेष भोग अर्पित करने की परंपरा है। ‘कोजागरी’ नाम को संस्कृत के ‘को जागर्ति?’—अर्थात ‘कौन जाग रहा है?’ से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात मां लक्ष्मी जागरण करने वाले भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। यह आस्था और परंपरा का हिस्सा है।
महाराष्ट्र में कोजागिरी पूर्णिमा
महाराष्ट्र में इसे कोजागिरी पूर्णिमा कहा जाता है। लोग चंद्रमा के दर्शन करते हैं, रात में जागरण और पूजा करते हैं तथा परिवार और मित्रों के साथ समय बिताते हैं। कई जगह चांदनी रात में दूध या मसाला दूध तैयार कर साझा करने की परंपरा भी है। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग भी कोजागिरी पूर्णिमा को लक्ष्मी-पूजन और रात्रि-जागरण से जुड़ा पर्व बताता है।
ओडिशा में कुमार पूर्णिमा
ओडिशा में इसी पूर्णिमा को कुमार पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। वहां की परंपराओं में सूर्य और चंद्रमा की पूजा, नए वस्त्र पहनना, गीत-संगीत और सामुदायिक उत्सव शामिल हैं। ओडिशा रिव्यू में कुमार पूर्णिमा पर युवतियों के चंद्र-पूजन, गीत-संगीत और पारिवारिक परंपराओं का उल्लेख मिलता है।
चांदनी में खीर रखने की परंपरा
उत्तर और मध्य भारत के कई परिवारों में शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाकर चांदनी में रखने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृत जैसा प्रभाव होता है और खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। यह धार्मिक-लोकविश्वास है; चांदनी में रखने से खीर के औषधीय गुण बढ़ने का दावा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है। खीर को बाहर रखते समय उसे धूल और कीड़ों से सुरक्षित रखना चाहिए।
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एक ही पूर्णिमा की रात—लेकिन हर क्षेत्र में उसका अपना नाम, स्वाद और उत्सव है। कहीं लक्ष्मी-पूजन और जागरण, कहीं नवविवाहित वर के सम्मान की रस्म, तो कहीं चंद्र-दर्शन और सामुदायिक उल्लास। यही विविधता शरद पूर्णिमा को देश की समृद्ध लोक-संस्कृतियों से जोड़ती है।
मिथिला में कोजगरा का खास संबंध नवविवाहित वर से है। परंपरा के अनुसार, वधू पक्ष से पान, मखाना, बताशा और मिठाइयों सहित उपहार भेजे जाते हैं। वर का चुमावन किया जाता है, महालक्ष्मी की पूजा होती है और प्रसाद बांटा जाता है।
बंगाल, असम और त्रिपुरा में इसी पूर्णिमा को कोजागरी लक्ष्मी पूजा के रूप में मनाया जाता है। घरों की सफाई, अल्पना, दीप जलाना और मां लक्ष्मी की आराधना इस पर्व का हिस्सा हैं। महाराष्ट्र में इसे कोजागिरी पूर्णिमा कहा जाता है; वहां भी लक्ष्मी पूजा और चांदनी रात से जुड़ी परंपराएं निभाई जाती हैं। रीति-रिवाज क्षेत्र के अनुसार बदलते हैं।





