JPSC की पहली परीक्षा से ही विवादों का साया, कॉपी में हेरफेर से OMR कांड तक सामने आईं गड़बड़ियां

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पहली-दूसरी सिविल सेवा परीक्षा की जांच CBI तक पहुंची, 6वीं से 14वीं परीक्षा तक भी विवाद और कानूनी पेंच जारी रहे

रांची: झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC की सिविल सेवा परीक्षाओं का इतिहास विवादों से जुड़ा रहा है। राज्य गठन के बाद पहली परीक्षा से लेकर हाल की 14वीं सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा तक अनियमितताओं, नियमों में बदलाव और कानूनी विवादों के मामले सामने आते रहे हैं।

JPSC ने वर्ष 2003 में पहली सिविल सेवा परीक्षा आयोजित की थी। इसके बाद दूसरी परीक्षा भी विवादों में घिर गई। दोनों परीक्षाओं में अंकों में हेरफेर, कॉपियों में काट-छांट और चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप लगे। मामला इतना बढ़ा कि निगरानी जांच के बाद CBI जांच तक पहुंचा और कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई।

इसके बाद तीसरी, चौथी और पांचवीं सिविल सेवा परीक्षाएं भी विवादों से अछूती नहीं रहीं। कहीं रिजल्ट और स्केलिंग को लेकर सवाल उठे, तो कहीं आरक्षण और परीक्षा प्रक्रिया को लेकर मामला अदालत पहुंचा।

छठी सिविल सेवा परीक्षा में तो प्रारंभिक परीक्षा के रिजल्ट को कई बार संशोधित करना पड़ा। अभ्यर्थियों की संख्या में बड़े बदलाव के बाद मामला हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

इसके बाद सातवीं से 10वीं सिविल सेवा परीक्षाओं को लंबे अंतराल के बाद संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। वहीं 11वीं से 13वीं संयुक्त परीक्षा भी विवादों में आ गई। TDPL से जुड़ी जांच और कथित लेन-देन के आरोप सामने आने के बाद सरकार ने परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया। हालांकि, इस फैसले के खिलाफ अदालत में मामला पहुंचा और नियुक्त अधिकारियों को राहत मिली।

अब मामला 14वीं सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा तक पहुंच चुका है। रिजल्ट जारी होने के बाद OMR शीट को लेकर सवाल उठे। एक अभ्यर्थी के बेहद कम अंक के बावजूद प्रारंभिक परीक्षा में सफल होने का मामला सामने आया। जांच में कथित तौर पर अभ्यर्थियों से लाखों रुपये लेने और OMR में हेरफेर के आरोप भी सामने आए।

मामले की जांच CID कर रही है और सफल अभ्यर्थियों की OMR शीट की प्रतियां भी मांगी गई हैं। राज्य सरकार 14वीं प्रारंभिक परीक्षा को रद्द कर चुकी है।

यानी JPSC की परीक्षा व्यवस्था में सुधार और पारदर्शिता की मांग कोई नई बात नहीं है। पहली परीक्षा से लेकर 14वीं परीक्षा तक बार-बार उठते सवाल अब आयोग की परीक्षा प्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर चर्चा खड़ी करते हैं।

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