पारंपरिक शिल्प अब आधुनिक डिजाइन और नवाचार के साथ नए रूप में उभर रहा है। स्थानीय कलाकारों की रचनाएं देश ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी अलग पहचान बना रही हैं।

रांचीः झारखंड की प्रसिद्ध टेराकोटा कला काफी पुरानी है। यह सिर्फ रेखाओं या रंगों का मेल नहीं है, बल्कि इंसानी भावनाओं, समाज की हकीकत और इतिहास को खुद में समेटे हुए एक जीवंत माध्यम है। कला जब किसी की जिंदगी बदलने का जरिया बन जाए, तो वो और भी खूबसूरत हो जाती है। रांची के बुंडू की रहने वाली प्रसिद्ध फाइन आर्टिस्ट रेशमा दत्ता ने यही कर दिखाया है। शांति निकेतन से फाइन आर्ट्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने अपनी कला को ग्रामीण महिलाओं की ताकत बनाने का फैसला किया।
टेराकोटा कला के दम पर महिलाएं बन रहीं आत्मनिर्भर और सशक्त

उन्होंने बुंडू में ‘आधार महिला उद्योग समिति’ की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से वो स्थानीय ग्रामीण महिलाओं को टेराकोटा, सेरामिक, डोकरा और म्युरल आर्ट की बारीकियां सिखाती हैं। आज इस संस्था से जुड़ी महिलाएं खूबसूरत टेराकोटा के बर्तन, कुल्हड़, मूर्तियां, आधुनिक ज्वेलरी और सजावटी सामान तैयार कर रही हैं। रेशमा की यह कोशिश न सिर्फ इस प्राचीन कला को जिंदा रख रही है, बल्कि सैकड़ों महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र और आत्मनिर्भर भी बना रही है।
प्रकृति की सादगी और माटी की खुशबू को संजोए टेराकोटा कला

झारखंड की यह कला सादगी और प्राकृति से जुड़ी है। यहां की मिट्टी इस कला के लिए सबसे बेहतरीन मानी जाती है। वैसे तो पारंपरिक रूप से सरहुल जैसे बड़े त्योहारों पर रांची और खूंटी के आदिवासी क्षेत्रों में टेराकोटा के हाथी-घोड़े बनाकर पवित्र स्थलों पर चढ़ाए जाने की परंपरा रही है। लेकिन आज, ‘झारक्राफ्ट’ जैसी संस्थाओं के सहयोग से स्थानीय कारीगर इसे आधुनिक रूप दे रहे हैं। अब यहां आकर्षक ट्राइबल मास्क, वॉल हैंगिंग और ट्रेंडी नेकलेस-इयररिंग्स भी बनाए जा रहे हैं।
आधुनिक डिजाइनों की मिलती है अच्छी कीमत

वह बताती हैं कि टेराकोटा कला उनके परिवार की पीढ़ियों पुरानी विरासत है। लेकिन एक समय ऐसा आया, जब मेहनत ज्यादा और आमदनी कम होने के कारण लोग इस पारंपरिक पेशे से दूर होने लगे। मिट्टी के बर्तनों को बाजार में उचित कीमत नहीं मिलती थी।
आधुनिक डिजाइन और तकनीक की ट्रेनिंग मिलने के बाद हालात बदल गए। अब पारंपरिक बर्तनों के साथ फैंसी फ्लावर पॉट, शोपीस, कप-प्लेट, डिनर सेट, केतली, कॉफी मग, वाइन ग्लास और विंड चाइम्स जैसे उत्पाद बनाए जा रहे हैं। इनकी अच्छी मांग और बेहतर कीमत से कलाकारों की आय बढ़ी है और नई पीढ़ी भी इस कला से जुड़ रही है।
मिट्टी से बने ये उत्पाद पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी हैं। इन्हें आसानी से साफ कर बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे टेराकोटा कला आधुनिक जीवनशैली में भी अपनी खास जगह बना रही है।
त्योहारों की दुकानों से राष्ट्रीय पहचान तक का सफर

20 साल का तजुर्बा और तकनीक का बदलाव

फाइन आर्टिस्ट रेशमा दत्ता बताती है कि इस कला से जुड़े अनुभवी कारीगर पिछले 15 से 20 वर्षों से टेराकोटा का काम कर रहे हैं और इसी से उनकी आजीविका चलती है। मिट्टी तैयार करने में बहुत मेहनत लगती है। एक बड़े गड्ढे में स्थानीय मिट्टी डालकर उसे पानी में अच्छी तरह घोलते हैं। जब कंकड़ नीचे बैठ जाते हैं, तो साफ मिट्टी को छानकर अलग कर लिया जाता है और पानी निकाल दिया जाता है।

