Toxic: यश-कियारा की फिल्म में दिखेगा रंगीन सर्कस, जानें असल जिंदगी में क्यों खाली पड़ी हैं सीटें
बड़ा सा तंबू, चारों तरफ चमकती रोशनी, स्टेज पर तेज म्यूजिक और कलाकार अपने करतब के लिए पूरी तरह तैयार। यह दृश्य फिल्म Toxic की दुनिया का हिस्सा होगा, जिसमें कियारा आडवाणी एक सर्कस कलाकार के किरदार में नजर आएंगी । लेकिन जैसे ही नजर असली दुनिया पर पड़ती है, तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। फिल्म Toxic में सर्कस की चमक दिखेगी, लेकिन जमीन पर सर्कस कलाकारों की मेहनत और उनके संघर्ष की कहानी कहीं ज्यादा गहरी है।
Toxic: पर्दे पर सर्कस की चमक
यश और कियारा आडवाणी की आने वाली फिल्म Toxic: A Fairy Tale for Grown-Ups 26 अगस्त 2026 को रिलीज हो रही है । Toxic में कियारा आडवाणी ‘नाडिया’ नाम के एक सर्कस कलाकार का किरदार निभा रही हैं । इस भूमिका के लिए उन्होंने इंटरनेशनल कलाकारों के साथ ट्रेनिंग की और ‘सर्क डू सोलेई’ से प्रेरित एक एक्ट किया है, जिसे भारतीय सिनेमा में पहले कभी नहीं देखा गया ।
Toxic में एक खास वॉटर-बाउल सर्कस एक्ट भी होगा, जिसे कियारा ने अपना ‘सबसे कठिन चैलेंज’ बताया है । फिल्म के ट्रेलर में सर्कस की दुनिया को काफी भव्य और रोमांचक दिखाया गया है । Toxic में कियारा के इस किरदार की तारीफ करते हुए यश ने कहा कि दर्शकों को इस फिल्म में कियारा का एक बिल्कुल अलग अवतार देखने को मिलेगा ।
Toxic के सर्कस और असलियत में फर्क
फिल्म Toxic के लिए एक सर्कस सेट तैयार करने में करीब तीन महीने लगे। मेकर्स ने टेंट की डिजाइन, उसकी मजबूती और कलाकारों के करतब के दौरान होने वाले दबाव तक का ध्यान रखा। लेकिन यह सब कैमरे के सामने केवल कुछ मिनटों के लिए था। फिल्म Toxic में सर्कस को दोबारा बनाया जा सकता है, लेकिन असली सर्कस को दर्शकों के लिए जिंदा रखना कहीं ज्यादा मुश्किल है।
असली जिंदगी में सर्कस आज संकट से गुजर रहा है। हजारों लोगों के बैठने की क्षमता वाले सर्कस में कई बार सिर्फ चार-पांच दर्शक नजर आते हैं। इसके बावजूद कलाकार अपना काम करते हैं। मेकअप होता है, कॉस्ट्यूम पहना जाता है और शो उसी ऊर्जा के साथ शुरू होता है, जैसे सामने पूरा तंबू दर्शकों से भरा हो। क्योंकि सर्कस की दुनिया में एक नियम आज भी नहीं बदला है—शो मस्ट गो ऑन।
40 साल सर्कस में: बिरजू की कहानी
करीब चार दशक से सर्कस की दुनिया से जुड़े बिरजू ने इस बदलाव को बेहद करीब से देखा है। उन्होंने अलग-अलग शहरों में सर्कस के साथ सफर किया और सालों तक जोकर बनकर दर्शकों का मनोरंजन किया। लेकिन आज कई बार हालात ऐसे होते हैं कि सामने सिर्फ कुछ दर्शक बैठे होते हैं।
बिरजू के अनुसार, सर्कस में काम करते हुए कई कलाकारों को गंभीर चोटें लगीं। किसी के पैर में चोट लगी तो किसी की कमर प्रभावित हुई। कई कलाकार ऐसे भी रहे जिनके लिए चोट के बाद सामान्य जिंदगी में लौटना मुश्किल हो गया। ऐसे में सवाल सिर्फ इलाज का नहीं है—सवाल यह है कि जब कलाकार अपने शरीर के दम पर काम करने की स्थिति में नहीं रहता, तब उसकी और उसके परिवार की जिम्मेदारी कौन उठाता है?
बिरजू ने अपनी जिंदगी का एक ऐसा अनुभव भी साझा किया, जिसने उन्हें गर्व के साथ-साथ सोचने पर मजबूर किया। एक बार विदेश में उनकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई। बातचीत के दौरान उन्हें पता चला कि उसके घर में एक भारतीय सर्कस कलाकार की तस्वीर लगी हुई है। जिस कलाकार को अपने देश में शायद बहुत कम लोग जानते हों, उसकी कला को विदेश में इतनी अहमियत दी जा रही थी कि उसकी तस्वीर घर में सहेजकर रखी गई थी।
सर्कस में कलाकारों को क्यों नहीं मिलता सम्मान?
बिरजू की बेटी ने उनसे एक सवाल पूछा था—जब आप करीब 40 साल से सर्कस में काम कर रहे हैं और खुद एक कलाकार हैं, तो सर्कस के कलाकारों को दूसरे क्षेत्रों के कलाकारों की तरह सम्मान और अवॉर्ड क्यों नहीं मिलते? फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों के काम को पुरस्कार मिलते हैं। खेल और दूसरे कला क्षेत्रों में भी उपलब्धियों को सम्मान मिलता है। लेकिन सर्कस के कलाकारों की मेहनत अक्सर पर्दे के पीछे ही रह जाती है।
जबकि उनका काम आसान नहीं होता। ऊंचाई पर करतब, संतुलन, जिम्नास्टिक और खतरनाक स्टंट के दौरान कलाकारों को अपने शरीर पर पूरा नियंत्रण रखना पड़ता है। एक छोटी सी गलती गंभीर चोट में बदल सकती है।
बिरजू ने बच्चों को सर्कस से दूर क्यों रखा?
बिरजू की कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास शायद यही है। जिस सर्कस ने उन्हें दशकों तक रोजगार दिया, उसी दुनिया को उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य के लिए नहीं चुना। उन्होंने बच्चों को अपनी पसंद का करियर चुनने की आजादी दी। नतीजा यह हुआ कि आज उनका एक बेटा फिल्म एडिटर है और दूसरा डॉक्टर।
बिरजू ने सर्कस से हुई कमाई से अपने बच्चों की पढ़ाई कराई। वह खुद ज्यादा पढ़ नहीं पाए, लेकिन उन्होंने यह तय किया कि उनके बच्चों के पास बेहतर विकल्प जरूर हों। यही बात सर्कस की मौजूदा स्थिति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है—जब एक सर्कस कलाकार अपने बच्चों को इस पेशे में नहीं देखना चाहता, तो आने वाली पीढ़ी में इस कला को आगे कौन बढ़ाएगा?
आधुनिक दौर में सर्कस की चुनौती
आज मनोरंजन के विकल्प पहले से कहीं ज्यादा हैं। टीवी, फिल्मों, ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने लोगों को घर बैठे मनोरंजन की अनगिनत सुविधाएं दे दी हैं। जिन करतबों को देखने के लिए कभी लोग सर्कस के तंबू तक पहुंचते थे, उनका एक हिस्सा अब मोबाइल स्क्रीन पर आसानी से देखा जा सकता है।
लेकिन लाइव सर्कस का अनुभव अलग है। कलाकार को अपनी आंखों के सामने जोखिम लेते देखना, करतब पूरा होने के बाद तालियों की आवाज और पूरे तंबू में बनता रोमांच—इसे स्क्रीन पूरी तरह दोहरा नहीं सकती। बस जरूरत है कि उन तालियों के लिए दर्शक फिर से तंबू तक पहुंचें।
Toxic फिल्म में सर्कस की दुनिया को भव्य और रंगीन दिखाया जाएगा । लेकिन जब कियारा आडवाणी बड़े पर्दे पर सर्कस आर्टिस्ट के रूप में नजर आएंगी, तब देश के किसी कोने में कोई असली सर्कस अपना शो शुरू कर चुका होगा । स्टेज पर रोशनी होगी, म्यूजिक बजेगा, कलाकार अपना करतब दिखाएगा। दर्शक कम होंगे, लेकिन कलाकार की मेहनत उतनी ही होगी। और सवाल वहीं रहेगा—क्या सर्कस की असली कला को बचाने के लिए सिर्फ कलाकारों का ‘शो मस्ट गो ऑन’ कहना काफी है, या दर्शकों को भी इस तंबू तक वापस आना होगा?


