झारखंड में मत्स्य पालन को नई दिशा देने के लिए राज्य सरकार एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रही है। मत्स्य निदेशालय राज्य के कई जिलों में ‘मगुर गांव’ (Magur Village) और लाइव जर्मप्लाज्म रिसोर्स सेंटर स्थापित करने की योजना पर काम कर रहा है। इसका उद्देश्य देशी मगुर मछली की प्रजाति का संरक्षण, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन और मछुआरा किसानों की आय में वृद्धि करना है।
देशी मगुर (Clarias magur) को हाल ही में झारखंड की राज्य मछली घोषित किया गया है । यह फैसला मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिया गया, जिससे इस प्रजाति के संरक्षण और वैज्ञानिक प्रजनन को बढ़ावा मिलेगा ।
Magur Village: ICAR के सहयोग से चलेगा अभियान
यह परियोजना ICAR-नेशनल ब्यूरो ऑफ फिश जेनेटिक रिसोर्सेज (लखनऊ) के सहयोग से संचालित की जाएगी। पहले चरण में रांची, गुमला, लोहरदगा और सिमडेगा जिलों को शामिल किया गया है । आगे चलकर इसे अन्य जिलों तक भी विस्तार देने की योजना है। ICAR-CIFA ने मगुर के लिए विशेष फीड (Starter-M, CIFA-Ma) और ग्रो-आउट कल्चर की तकनीक विकसित की है, जिसका उपयोग इन गांवों में किया जाएगा ।
Magur Village: देशी मगुर प्रजाति को मिलेगा संरक्षण
मत्स्य विभाग के अनुसार इस पहल का मुख्य उद्देश्य 100 प्रतिशत शुद्ध देशी मगुर (Clarias magur) का संरक्षण और उत्पादन बढ़ाना है। इसके लिए आधुनिक मॉलिक्यूलर PCR टेस्टिंग तकनीक का उपयोग कर हाइब्रिड प्रजातियों की पहचान कर उन्हें अलग किया जाएगा, ताकि केवल शुद्ध देशी नस्ल का संवर्धन हो सके।
यह पहल इसलिए जरूरी है क्योंकि देशी मगुर (Clarias magur) IUCN द्वारा संकटग्रस्त (Endangered) प्रजाति घोषित की जा चुकी है । इसके प्राकृतिक आवास का नष्ट होना, अत्यधिक मछली पकड़ना और हाइब्रिड प्रजातियों (जैसे थाई मगुर) का प्रसार इसके लिए जिम्मेदार है । थाई मगुर (Clarias gariepinus) एक आक्रामक प्रजाति है जो देशी मगुर के अस्तित्व को खतरे में डाल रही है ।
Magur Village: क्यों जरूरी है यह पहल?
विशेषज्ञों के अनुसार देशी कैटफिश (मगुर) की संख्या लगातार घट रही है। इसके पीछे प्राकृतिक आवास का नष्ट होना, पर्यावरणीय दबाव और अत्यधिक मछली पकड़ना प्रमुख कारण हैं। नई योजना इन चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
देशी मगुर को इसलिए भी महत्व दिया जाता है क्योंकि यह औषधीय गुणों से भरपूर है। यह ओमेगा-3 फैटी एसिड और प्रोटीन से समृद्ध है, जो कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण, ब्लड प्रेशर नियमन और हृदय रोगों के जोखिम को कम करने में मदद करता है । बाजार में देशी मगुर की कीमत 600 रुपये किलो तक है, जो थाई मगुर (300 रुपये) से दोगुनी है ।
Magur Village: महिला और आदिवासी किसानों को मिलेगा लाभ
विभाग के अनुसार लातेहार जिले में पहले ही 1.60 लाख गुणवत्तापूर्ण मछली बीज उपलब्ध कराए जा चुके हैं। इस पहल से विशेष रूप से अनुसूचित जनजाति, महिला मछुआरा किसान और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के लाभार्थियों को सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है।
ICAR नागालैंड सेंटर ने भी आदिवासी किसानों को मगुर प्रजनन के लिए प्रोत्साहित किया है, जिससे बीज की कमी को दूर किया जा सके । झारखंड में मगुर गांव मॉडल से ग्रामीण मछुआरों को आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण और गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाएगा।
Magur Village: पूरे राज्य में विस्तार की तैयारी
मत्स्य निदेशालय ने संकेत दिया है कि प्रारंभिक चरण की सफलता के बाद ‘मगुर गांव’ मॉडल को पूरे झारखंड में लागू किया जाएगा। इससे देशी मछली प्रजातियों का संरक्षण, मत्स्य उत्पादन में वृद्धि और हजारों मछुआरा परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने की उम्मीद है। यह कदम झारखंड को मगुर उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने और स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
बाहरी संसाधन
- ICAR-National Bureau of Fish Genetic Resources: https://nbfgr.icar.gov.in
- ICAR-Central Institute of Freshwater Aquaculture: https://cifa.nic.in
- झारखंड मत्स्य विभाग: https://www.jharkhand.gov.in/fisheries
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