प्रकृति, खेती और सामुदायिक एकता से जुड़ा है करम पर्व; जावा, करम डाल और पारंपरिक नृत्य के जरिए निभायी जाती हैं सदियों पुरानी परंपराएं

रांची: झारखंड की लोक संस्कृति में करम पर्व का अपना खास स्थान है। यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती, भाई-बहन के रिश्ते, दोस्ती और सामुदायिक एकता से जुड़ा लोकपर्व है। इस दिन करम वृक्ष की डाल को पवित्र मानकर उसकी पूजा की जाती है। वहीं, बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
2026 में करम पर्व 22 सितंबर, मंगलवार को मनाया जा रहा है।
करम डाल को क्यों माना जाता है पवित्र?
करम पर्व में करम वृक्ष की हरी डाल को विशेष महत्व दिया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार इसे कर्म देवता का प्रतीक माना जाता है। पूजा के दौरान करम डाल को घर के आंगन या गांव के अखाड़े में स्थापित किया जाता है और विधि-विधान से इसकी पूजा की जाती है। करम पर्व का संबंध खेती और प्रकृति से भी गहरा है। फसल की अच्छी पैदावार, परिवार की खुशहाली और प्रकृति की कृपा की कामना के साथ यह पर्व मनाया जाता है।
जावा से शुरू होती है पूजा की तैयारी
करम पूजा की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। इसके लिए नदी या अन्य प्राकृतिक स्रोत से रेत लाकर उसमें अलग-अलग प्रकार के अनाज के बीज बोए जाते हैं। इनमें जौ, मक्का, गेहूं, चावल, चना, कुल्थी और मसूर शामिल हैं।
इन बीजों से तैयार होने वाले अंकुरों को जावा कहा जाता है। इसे नई जिंदगी, उर्वरता और अच्छी फसल की उम्मीद से जोड़ा जाता है।
पूजा के दौरान करम वृक्ष की तीन डालियां भी स्थापित की जाती हैं। अलग-अलग परंपराओं में इनका प्रतीकात्मक अर्थ अलग बताया जाता है। कई जगह इन्हें त्रिदेव और आकाश-पृथ्वी-पाताल जैसे प्राकृतिक तत्वों से जोड़कर देखा जाता है।
भाई-बहन के रिश्ते से भी जुड़ा है करम
करम पर्व में भाई-बहन के रिश्ते की भी खास भूमिका है। इस अवसर पर बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।करम पर्व में प्रकृति की पूजा के साथ परिवार और रिश्तों की खुशहाली की भावना भी जुड़ी हुई है।
‘सहिया’ की परंपरा क्या है?
करम पर्व से जुड़ी ‘सहिया’ की परंपरा भी काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। सहिया का संबंध दोस्ती और आपसी जुड़ाव से है।
इस परंपरा के जरिए लोगों के बीच रिश्तों को मजबूत करने और एक-दूसरे के साथ सहयोग की भावना को बढ़ावा दिया जाता है। आदिवासी समाज में सहिया को लंबे समय तक कायम रहने वाली दोस्ती और सामाजिक संबंधों से जोड़कर देखा जाता है।
करम नृत्य के बिना अधूरा है पर्व
करम पूजा के बाद गांव और समुदाय के लोग पारंपरिक गीतों और करम नृत्य में शामिल होते हैं। मांदर की थाप पर सामूहिक नृत्य और गीत इस पर्व की सबसे आकर्षक परंपराओं में शामिल हैं।
करम गीतों में सिर्फ मनोरंजन नहीं होता, बल्कि इनके जरिए खेती, प्रकृति, प्रेम, समाज और जीवन से जुड़े अनुभवों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है। यही वजह है कि करम नृत्य को लोक संस्कृति को बचाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी माना जाता है।
करम-धरम की लोककथा क्या कहती है?
करम पर्व से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा करम और धरम नाम के दो भाइयों की है। लोककथा के अनुसार दोनों भाइयों के विचार और जीवन जीने का तरीका अलग था। कहा जाता है कि एक विवाद के दौरान करम वृक्ष की डाल का अपमान हुआ। इसके बाद परिवार के जीवन में परेशानियां आने लगीं और सुख-समृद्धि खत्म होने लगी। बाद में गलती का एहसास होने पर करम देवता से क्षमा मांगी गयी और करम वृक्ष की पूजा की गयी।
लोकविश्वास के अनुसार इसके बाद परिवार के जीवन में दोबारा खुशहाली लौटने लगी। इसी कथा से जुड़ी मान्यता के कारण करम पर्व पर करम डाल को पवित्र मानकर उसकी पूजा करने की परंपरा चली आ रही है।
प्रकृति संरक्षण का भी देता है संदेश
करम पर्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक इसका प्रकृति से सीधा जुड़ाव है। पेड़-पौधों, जंगल, खेती और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान इस पर्व की परंपराओं में दिखाई देता है।
इसके साथ ही यह पर्व भाई-बहन के रिश्ते, दोस्ती, सामाजिक सहयोग और सामुदायिक एकता को भी मजबूत करता है। यही वजह है कि बदलते समय के बावजूद करम पर्व झारखंड की लोक संस्कृति और आदिवासी परंपराओं में आज भी अपनी खास पहचान बनाए हुए है।





