
800 साल से खड़ा है झारखंड का यह रहस्यमयी मंदिर, अब खीरी मठ को मिलेगा नया जीवन!

रांची/रामगढ़: झारखंड के रामगढ़ जिले में मौजूद करीब 800 वर्ष पुराने ऐतिहासिक बौद्ध मंदिर ‘खीरी मठ’ को संरक्षित और पुनर्स्थापित करने की तैयारी शुरू हो गई है। रामगढ़-बोकारो राष्ट्रीय राजमार्ग के पास स्थित यह प्राचीन मंदिर पाल काल से जुड़ा माना जाता है। ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को देखते हुए प्रशासन इसके मूल स्वरूप और पहचान को सुरक्षित रखते हुए जीर्णोद्धार की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
उत्तर छोटानागपुर प्रमंडल के आयुक्त विजय कुमार गुप्ता ने गोला प्रखंड के खीरी मठ का दौरा कर मंदिर की वर्तमान स्थिति का जायजा लिया। उन्होंने स्थानीय लोगों से भी मंदिर के इतिहास और संरक्षण को लेकर बातचीत की।
आयुक्त के मुताबिक खीरी मठ इस क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रयास है कि इस प्राचीन स्मारक को संरक्षित किया जाए और इसकी मूल पहचान को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाकर रखा जाए।
12वीं-13वीं शताब्दी का माना जा रहा मंदिर
स्थानीय इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार मंदिर का निर्माण करीब 12वीं से 13वीं शताब्दी के बीच हुआ माना जाता है। इसके निर्माण काल का अनुमान चतरा जिले के प्रसिद्ध बौद्ध और पुरातात्विक स्थल इटखोरी में मिले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पुरावशेषों से तुलना के आधार पर लगाया गया है।
विशेषज्ञ इसे पाल युग के बाद के काल से जोड़कर देखते हैं। इसकी स्थापत्य शैली में प्राचीन वास्तुकला और धार्मिक परंपराओं का अनूठा मेल दिखाई देता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सदियों पुराना होने के बावजूद मंदिर का मुख्य ढांचा आज भी काफी हद तक सुरक्षित बताया जा रहा है। यही वजह है कि इसके वैज्ञानिक संरक्षण और पुनर्स्थापन की संभावना पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
करीब 50 फीट ऊंचा है खीरी मठ
मंदिर की स्थापत्य कला भी इसे खास बनाती है। इसका आधार लगभग 20.5 फीट × 18.5 फीट का बताया गया है, जबकि इसकी ऊंचाई करीब 50 फीट है।
मंदिर का निर्माण उत्तर भारतीय नागर स्थापत्य शैली में हुआ माना जाता है। इसकी संरचना दो मंजिला है और मुख्य मेहराबदार प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की ओर है। इसकी बनावट में प्राचीन भारतीय मंदिर स्थापत्य की कई विशेषताएं नजर आती हैं।
लंबे समय से प्राकृतिक प्रभाव और उचित संरक्षण की कमी के बावजूद मंदिर का खड़ा रहना इसकी निर्माण तकनीक की मजबूती को भी दर्शाता है।
ASI तक पहुंचा संरक्षण का प्रस्ताव
खीरी मठ के संरक्षण को लेकर जिला प्रशासन की ओर से मामला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) तक पहुंचाए जाने की बात सामने आई है। इसका उद्देश्य मंदिर की ऐतिहासिकता और संरचना का वैज्ञानिक अध्ययन कराकर इसके संरक्षण की दिशा में उचित कदम उठाना है।
यदि पुरातात्विक और ऐतिहासिक अध्ययन के बाद इसके संरक्षण और जीर्णोद्धार की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो कोशिश यह होगी कि मंदिर के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ किए बिना उसे सुरक्षित किया जाए।
ऐतिहासिक धरोहरों के जीर्णोद्धार में यह बेहद महत्वपूर्ण होता है कि आधुनिक निर्माण के नाम पर उनकी प्राचीन पहचान खत्म न हो। इसलिए खीरी मठ के मामले में भी मूल वास्तुकला और ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने पर जोर दिया जा रहा है।
इटखोरी से जुड़ता है इतिहास का सिरा
खीरी मठ की उम्र का आकलन करते समय विशेषज्ञों ने चतरा के इटखोरी में मिले पुरातात्विक अवशेषों को महत्वपूर्ण आधार माना है। इटखोरी झारखंड के प्रमुख ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों में शामिल है और यहां बौद्ध परंपरा से जुड़े महत्वपूर्ण पुरावशेष मिले हैं।
दोनों क्षेत्रों के पुरातात्विक संकेतों की तुलना खीरी मठ के इतिहास को समझने में मदद कर सकती है। विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन के बाद मंदिर के निर्माण काल और इससे जुड़े धार्मिक-सांस्कृतिक इतिहास की और स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है।
पर्यटन के नक्शे पर उभर सकता है खीरी मठ
खीरी मठ का संरक्षण केवल एक पुरानी इमारत को बचाने तक सीमित नहीं है। अगर मंदिर का वैज्ञानिक तरीके से जीर्णोद्धार होता है और आसपास बुनियादी पर्यटन सुविधाएं विकसित की जाती हैं, तो यह रामगढ़ और झारखंड के हेरिटेज टूरिज्म के लिए भी महत्वपूर्ण स्थल बन सकता है।
झारखंड को आमतौर पर जंगल, झरने, पहाड़ और खनिज संपदा के लिए जाना जाता है, लेकिन राज्य के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरें मौजूद हैं, जिनकी कहानी अभी बड़े स्तर पर लोगों तक नहीं पहुंची है।
करीब आठ शताब्दियों से समय की मार झेलते हुए खड़ा खीरी मठ झारखंड के उसी अनदेखे इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अब इसके संरक्षण की पहल आगे बढ़ती है तो आने वाली पीढ़ियां भी इस प्राचीन विरासत को करीब से देख और समझ सकेंगी।



