रांची में परिसीमन के खिलाफ आदिवासी महाजुटान, मोरहाबादी में जुटी भारी भीड़; राजनीतिक प्रतिनिधित्व बचाने की उठी आवाज

0
58
Share This Post

बंधु तिर्की के नेतृत्व में आयोजित रैली में झारखंड के कई जिलों से पहुंचे लोग, एसटी सीटों और आदिवासी अधिकारों पर जताई चिंता

रांची: प्रस्तावित परिसीमन के विरोध में रविवार को राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में आदिवासी महाजुटान का आयोजन किया गया। पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के नेतृत्व में हुई इस रैली में झारखंड के अलग-अलग जिलों से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग पहुंचे। आयोजकों की ओर से करीब एक लाख लोगों के जुटने का दावा किया गया।

सुबह से ही मोरहाबादी मैदान की ओर लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। रैली में महिलाएं, युवा, बुजुर्ग और बच्चे भी शामिल हुए। कई लोग अपने गांव और क्षेत्र से सामूहिक रूप से रांची पहुंचे।

परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज की चिंता

महाजुटान में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज की आशंकाएं प्रमुखता से सामने आईं। मंच से वक्ताओं ने कहा कि निर्वाचन क्षेत्रों के भविष्य में होने वाले पुनर्गठन का असर झारखंड में आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है।

कार्यक्रम में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, प्रभारी के. राजू, रामेश्वर उरांव, मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, सुबोध कांत सहाय, सुखदेव भगत, विधायक राजेश कच्छप, नमन विक्सल कोंगाड़ी और ऑल इंडिया आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया समेत कई नेता मौजूद रहे।

दिहाड़ी छोड़कर पहुंचे लोग, चंदा जुटाकर आईं महिलाएं

मोरहाबादी मैदान में जुटी भीड़ में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ बड़ी संख्या में आम लोग भी नजर आए। कई महिलाओं ने बताया कि वे आपस में चंदा जुटाकर रांची पहुंची हैं। वहीं कुछ लोगों ने कहा कि उन्होंने एक दिन की मजदूरी छोड़कर महाजुटान में हिस्सा लिया।

कई महिलाएं अपने साथ खाने-पीने का सामान लेकर पहुंचीं। मैदान में बैठकर भोजन करते हुए भी लोग दिखाई दिए। इससे आयोजन में ग्रामीण और आम आदिवासी समाज की भागीदारी भी नजर आई।

क्या है परिसीमन और क्यों उठ रहा सवाल?

परिसीमन का अर्थ लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का नए सिरे से निर्धारण है। इसमें जनसंख्या के साथ भौगोलिक स्थिति, प्रशासनिक सीमाएं और जनसुविधा जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।

झारखंड में परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठनों की मुख्य चिंता एसटी आरक्षित सीटों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर है। फिलहाल राज्य विधानसभा में 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, जबकि लोकसभा में 5 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं।

आदिवासी संगठनों की क्या है मांग?

महाजुटान में शामिल संगठनों का तर्क है कि भविष्य में सीटों के पुनर्गठन में केवल जनसंख्या को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। आदिवासी बहुल क्षेत्रों की सामाजिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखने की मांग की गई।

वक्ताओं ने कहा कि झारखंड में आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकार और राजनीतिक हिस्सेदारी सुरक्षित रहनी चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर रैली में ‘अब नहीं तो कभी नहीं’ जैसे नारे भी लगाए गए।

अनुच्छेद 342 का भी उठा मुद्दा

कार्यक्रम के दौरान संविधान के अनुच्छेद 342 का भी उल्लेख किया गया। वक्ताओं ने कहा कि अनुसूचित जनजातियों से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों में किसी तरह का बदलाव किया जाना है, तो इसके लिए संविधान में निर्धारित प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।

हालांकि, परिसीमन के बाद झारखंड में एसटी आरक्षित सीटों की संख्या निश्चित रूप से घटेगी, ऐसा अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। सीटों में संभावित बदलाव को लेकर अलग-अलग स्तर पर आकलन और राजनीतिक बहस जारी है।

2029 के चुनाव को लेकर भी चर्चा

परिसीमन को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर भी सीटों के पुनर्गठन की चर्चा चल रही है। प्रस्तावित मॉडल में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या बढ़ाने की बात सामने आई है। हालांकि, नए परिसीमन की अंतिम तस्वीर और झारखंड की सीटों पर इसका वास्तविक असर संबंधित संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।

फिलहाल रांची के मोरहाबादी मैदान से आयोजित यह महाजुटान इस बात का संकेत है कि परिसीमन का मुद्दा झारखंड में आदिवासी समाज के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों से जोड़कर देखा जा रहा है।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here