‘नवजीवन-2’ अभियान के तहत 11 पुरुष और 5 महिला नक्सलियों ने छोड़ा हथियार; जंगल में भोजन-दवा की कमी और सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव को बताया आत्मसमर्पण की बड़ी वजह

रांची: झारखंड में नक्सल विरोधी अभियान के बीच सुरक्षाबलों को बड़ी सफलता मिली है। भाकपा (माओवादी) से जुड़े 16 नक्सलियों ने मंगलवार को पुलिस मुख्यालय में आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें 11 पुरुष और पांच महिलाएं शामिल हैं। सभी ने पुलिस के ‘नवजीवन-2’ अभियान के तहत मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। आत्मसमर्पण करने वालों में कभी गिरिडीह और चाईबासा क्षेत्र में सक्रिय रहा संतोष उर्फ बासुदेव दा उर्फ गांधी उर्फ दिलीप उर्फ संजय महतो उर्फ बासुकू उर्फ श्याम भी शामिल है। उस पर राज्य सरकार की ओर से ₹15 लाख का इनाम घोषित था।
बीमारी और जंगल की मुश्किल जिंदगी से परेशान था संतोष
आत्मसमर्पण के बाद संतोष ने जंगल में बिताए अपने जीवन और मौजूदा स्थिति के बारे में बताया। उसके मुताबिक वह करीब 1985-88 के दौरान नक्सली दस्ते में शामिल हुआ था।
अब उसकी सेहत काफी खराब हो चुकी है। उसने बताया कि उसका शुगर लेवल काफी अधिक रहता है और याददाश्त भी पहले जैसी नहीं रही। कुछ समय पहले उसकी तबीयत ज्यादा बिगड़ी, लेकिन जंगल में उसे जरूरी दवाएं तक नहीं मिल सकीं। उसके परिवार के सदस्य पुलिस के संपर्क में थे और उन्होंने उसे आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने की सलाह दी। इसके बाद उसने काफी सोच-विचार कर हथियार छोड़ने का फैसला किया।
सालमी मुंडा ने कहा, जंगल में कई दिनों तक खाना-पानी भी नहीं मिलता
बुंडू क्षेत्र में सक्रिय रही सालमी मुंडा, जो अपना नाम पारूल बताती है, ने भी आत्मसमर्पण के बाद अपनी कहानी साझा की। उसने कहा कि वह भटककर नक्सली दस्ते में शामिल हो गई थी और अब उसे अपने फैसले पर पछतावा है। उसके मुताबिक जंगल में जीवन बेहद मुश्किल हो गया था। कई बार कई दिनों तक पर्याप्त खाना और पानी तक नहीं मिलता था। उसने यह भी कहा कि ग्रामीणों का नक्सलियों के प्रति रवैया बदल चुका है और पहले जैसा समर्थन नहीं मिलता। पुलिस के संपर्क में आने के बाद उसने भी आत्मसमर्पण का रास्ता चुना।
डीजीपी ने बताया बड़ी उपलब्धि
आत्मसमर्पण कार्यक्रम के दौरान डीजीपी तदाशा मिश्रा, आईजी ऑपरेशन नरेंद्र सिंह, सीआरपीएफ आईजी साकेत सिंह और अनूप बिरथरे समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
डीजीपी तदाशा मिश्रा ने 16 नक्सलियों के आत्मसमर्पण को बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि राज्य में नक्सलवाद अब समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। साथ ही भरोसा दिलाया कि आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को सरकार की निर्धारित नीति के तहत मिलने वाली सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
सारंडा में सुरक्षा बलों ने बनाया दोहरा घेरा
सुरक्षा बलों की रणनीति ने भी नक्सलियों पर दबाव बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। सारंडा इलाके में नक्सलियों के जमावड़े के बाद सुरक्षाबलों ने क्षेत्र में दोहरा सुरक्षा घेरा तैयार किया और 24 छोटे पुलिस कैंप स्थापित किए। इन कैंपों में चौबीसों घंटे जवानों की मौजूदगी से नक्सलियों और ग्रामीणों के बीच संपर्क कमजोर होता चला गया। इसका सीधा असर नक्सली दस्तों तक पहुंचने वाले भोजन, दवाओं और दूसरी जरूरी चीजों पर पड़ा।
ड्रोन निगरानी से मुश्किल हुआ मूवमेंट
सुरक्षा बलों ने जंगल में नक्सलियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ड्रोन निगरानी भी बढ़ाई। इसके चलते बड़े समूह में आवाजाही करना मुश्किल हो गया और नक्सली छोटे समूहों में चलने तथा लगातार ठिकाने बदलने को मजबूर हुए।
इसी दौरान अलग-अलग मुठभेड़ों में 17 नक्सलियों के मारे जाने की बात सामने आई। इनमें कथित तौर पर ऐसे सदस्य भी शामिल थे जिन्हें जंगल में लगाए गए आईईडी की जगहों की जानकारी थी। उनके मारे जाने के बाद जंगल में नक्सलियों के लिए सुरक्षित आवाजाही और मुश्किल हो गई।
आईईडी की चपेट में आई महिला नक्सली
इसी दौरान मूवमेंट करते समय एक महिला नक्सली का पैर कथित तौर पर आईईडी पर पड़ गया, जिससे उसकी एक टांग गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई। इस घटना के बाद नक्सली सारंडा क्षेत्र छोड़कर दूसरे इलाकों की ओर जाने लगे। लगातार सुरक्षा अभियान, ड्रोन से निगरानी, ग्रामीण संपर्क कमजोर पड़ने, भोजन और दवाओं की कमी तथा जंगल में सुरक्षित आवाजाही की मुश्किलों ने नक्सली दस्तों पर दबाव बढ़ा दिया।
पुलिस का मानना है कि इन्हीं परिस्थितियों और आत्मसमर्पण नीति के प्रभाव के कारण एक साथ 16 नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया है।

