APAAR ID: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया- न तो अनिवार्य, अभिभावकों पर नहीं डाल सकते दबाव, जानें क्या है नियम

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APAAR ID: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने APAAR ID (ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री) को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी छात्र के अभिभावकों को APAAR ID बनवाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया स्वैच्छिक है और इसे अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता ।

यह फैसला उस याचिका की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कई स्कूल APAAR ID के लिए अभिभावकों पर दबाव बना रहे हैं और आधार संख्या उपलब्ध कराने के लिए बाध्य कर रहे हैं । सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अभिभावकों को APAAR ID के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता 


APAAR ID क्या है?

APAAR ID, यानी ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री, एक 12 अंकों की अनूठी पहचान संख्या है, जो ‘एक राष्ट्र, एक छात्र आईडी’ पहल का हिस्सा है । यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत शुरू किया गया एक डिजिटल पहल है 

APAAR ID के मुख्य लाभ

APAAR ID एक छात्र की आजीवन डिजिटल शैक्षणिक पहचान के रूप में कार्य करता है । यह शैक्षणिक रिकॉर्ड, मार्कशीट, डिग्री, प्रमाणपत्र और सह-पाठ्यक्रम उपलब्धियों को डिजिटल रूप से संग्रहीत, प्रबंधित और एक्सेस करने में मदद करता है । APAAR ID डिजी लॉकर और अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट (ABC) से जुड़ा हुआ है, जिससे छात्रों को अपने शैक्षणिक दस्तावेज़ सुरक्षित रूप से ऑनलाइन एक्सेस करने की सुविधा मिलती है 


APAAR ID पर विवाद क्यों है?

इसके लाभों के बावजूद, APAAR ID कई कारणों से विवादों में रहा है:

  1. स्वैच्छिक बनाम अनिवार्य: सरकार इसे स्वैच्छिक बताती है, लेकिन कई राज्यों और संस्थानों में इसे प्रभावी रूप से अनिवार्य बनाया जा रहा है । CBSE ने 2026 की बोर्ड परीक्षाओं के लिए APAAR ID को अनिवार्य कर दिया है, जिससे यह व्यावहारिक रूप से अनिवार्य हो गया है 
  2. प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा: APAAR ID के लिए आधार नंबर, नाम, जन्मतिथि और अन्य व्यक्तिगत जानकारी साझा करनी होती है । अभिभावकों को डेटा के दुरुपयोग और लीक होने की आशंका है । सुप्रीम कोर्ट के पुट्टास्वामी फैसले में यह स्पष्ट किया गया था कि आधार को स्कूलों में अनिवार्य नहीं किया जा सकता क्योंकि शिक्षा मौलिक अधिकार है 
  3. सूचित सहमति की कमी: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अभिभावकों को सही मायने में सहमति देने या मना करने का विकल्प नहीं दिया जाता । कई अभिभावक, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, APAAR ID के डेटा शेयरिंग के निहितार्थ को पूरी तरह से नहीं समझ पाते 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

  • APAAR ID पूरी तरह स्वैच्छिक है और इसे अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता 
  • अभिभावकों पर दबाव नहीं बनाया जा सकता 
  • CBSE को ओडिशा हाईकोर्ट के निर्देशों को देशभर में लागू करना होगा 
  • यह सुनिश्चित करना होगा कि यह योजना डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 के अनुरूप हो 
  • नामांकन से पहले सहमति देने से इंकार करने का विकल्प होना चाहिए 

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला APAAR ID को लेकर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण है। यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी छात्र या अभिभावक को इस डिजिटल पहचान प्रणाली को अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और उनकी गोपनीयता का अधिकार सुरक्षित रहेगा 

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