रांची: झारखंड में इस साल खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही सूखे जैसे हालात बनने के संकेत मिलने लगे हैं। महालनोबिस नेशनल क्रॉप फोरकास्ट सेंटर (MNCFC) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में रूट-ज़ोन सॉयल मॉइस्चर (RZSM) यानी मिट्टी की गहराई में मौजूद नमी पिछले 10 वर्षों (2016-2025) के औसत से कम दर्ज की गई है। इससे खरीफ फसलों की बुवाई और शुरुआती वृद्धि पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड उन राज्यों में शामिल है जहां मिट्टी की जड़ क्षेत्र की नमी सामान्य से कम पाई गई है। इसी श्रेणी में छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, हरियाणा, राजस्थान और दक्षिणी पश्चिम बंगाल के कई हिस्से भी शामिल हैं।
खरीफ बुवाई पर मंडरा रहा खतरा
रिपोर्ट में झारखंड के जिलों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
- पर्याप्त नमी (70-100%): पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां, पूर्वी सिंहभूम, सिमडेगा, रांची, गुमला, जामताड़ा और साहिबगंज।
- मध्यम से अधिक नमी (50-70%): हजारीबाग, रामगढ़, बोकारो, गिरिडीह, धनबाद, देवघर, दुमका, गोड्डा, पाकुड़ और गढ़वा।
- अपेक्षाकृत कम नमी (40-50%): पलामू, गढ़वा के कुछ हिस्से, लातेहार, चतरा और कोडरमा।
80 प्रतिशत खेती बारिश पर निर्भर
झारखंड में लगभग 80 प्रतिशत कृषि वर्षा आधारित है। सबसे अधिक खरीफ खेती धान की होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में अच्छी और व्यापक बारिश नहीं हुई तो धान समेत अन्य खरीफ फसलों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
क्या है रूट-ज़ोन सॉयल मॉइस्चर?
रूट-ज़ोन सॉयल मॉइस्चर मिट्टी की उस गहराई की नमी को दर्शाता है जहां पौधों की जड़ें पोषक तत्व और पानी ग्रहण करती हैं। यदि इस स्तर पर नमी कम हो जाए तो बीज अंकुरण, पौधों की वृद्धि, फूल और दाना बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञ इसे सूखे का शुरुआती संकेत मानते हैं।
विशेषज्ञों की सलाह
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के आधार पर बुवाई की योजना बनाने, उपलब्ध सिंचाई संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने और वर्षा की स्थिति पर लगातार नजर रखने की सलाह दी है। यदि जुलाई के दूसरे और तीसरे सप्ताह में सामान्य या उससे अधिक बारिश होती है, तो मिट्टी की नमी में सुधार की संभावना बनी रहेगी।
फिलहाल रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि झारखंड में मानसून के बावजूद मिट्टी की नमी अपेक्षित स्तर से कम है, जिससे खरीफ सीजन पर विशेष निगरानी की आवश्यकता है।

