लोककला से बदली 130 परिवारों की जिंदगी: लूमंग क्राफ्ट बना झारखंड की महिलाओं की नई पहचान

0
92
Share This Post
फैशन डिजाइनर अभिलाषा ने कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ शुरू की पहल, सोहराई समेत 53 पारंपरिक शिल्पों को मिला नया बाजार

रांची: झारखंड की पारंपरिक कला और संस्कृति को रोजगार से जोड़ने की दिशा में हरमू स्थित लूमंग क्राफ्ट एक सफल मॉडल बनकर उभरा है। वर्ष 2018 में फैशन डिजाइनर अभिलाषा द्वारा शुरू की गई इस पहल ने आज राज्य के 130 से अधिक परिवारों को आजीविका से जोड़ दिया है। ग्रामीण महिलाओं के हाथों तैयार होने वाले सोहराई, जादोपटिया, पैतकर और अन्य लोक कलाओं से जुड़े हस्तशिल्प उत्पाद अब देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक अपनी पहचान बना रहे हैं।

जमशेदपुर की रहने वाली अभिलाषा पिछले 15 वर्षों से रांची में रह रही हैं। वर्ष 2012 में फैशन डिजाइनिंग का प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने हैंडलूम क्षेत्र में काम किया और मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करने के बावजूद अपने राज्य लौटकर स्थानीय महिलाओं के साथ कुछ नया करने का फैसला किया। इसी सोच के साथ उन्होंने लूमंग क्राफ्ट की शुरुआत की, जो आज सैकड़ों लोगों की आजीविका का मजबूत आधार बन चुका है।

अभिलाषा बताती हैं कि गांवों में कई महिलाओं के पास पारंपरिक लोक कलाओं का हुनर तो था, लेकिन उन्हें बाजार और प्रशिक्षण नहीं मिल पा रहा था। इसे ध्यान में रखते हुए संस्था ने 45 से 60 दिनों का प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया। प्रशिक्षण की शुरुआत कागज पर पेंटिंग से होती है और धीरे-धीरे प्रतिभागियों को हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करने की पूरी प्रक्रिया सिखाई जाती है।

संस्था में 20 वर्ष से लेकर 72 वर्ष तक की महिलाएं सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। कोई रेशम से धागा तैयार करती है, तो कोई डिजाइनिंग, सिलाई, कढ़ाई और हस्तशिल्प निर्माण की जिम्मेदारी संभालती है। कई महिलाएं टीम लीडर और उत्पादन प्रबंधन जैसे दायित्व भी निभा रही हैं।

लूमंग क्राफ्ट आज सोहराई, डोकरा, बांस, लेदरा, काथा और जरदोजी सहित 53 पारंपरिक शिल्प श्रेणियों में कार्य कर रहा है। यहां तैयार उत्पाद स्पेन, जर्मनी समेत कई देशों तक पहुंच चुके हैं। संस्था पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी काम कर रही है और कपड़ों की बची हुई कतरनों से बैग जैसे उपयोगी उत्पाद तैयार कर अपशिष्ट को भी नया रूप दे रही है।

लूमंग क्राफ्ट की उपलब्धियां राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना चुकी हैं। संस्था द्वारा तैयार सोहराई कला से सजा शॉल प्रधानमंत्री को भेंट किया जा चुका है। वहीं, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सम्मान स्वरूप यहां निर्मित तसर साड़ी भी भेंट की गई थी। यह उपलब्धि झारखंड की लोककला और ग्रामीण महिलाओं की मेहनत को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का उदाहरण बन गई है।

आज लूमंग क्राफ्ट यह साबित कर रहा है कि यदि पारंपरिक कला को आधुनिक बाजार, प्रशिक्षण और सही मंच मिले, तो वह न केवल सांस्कृतिक विरासत को सहेज सकती है, बल्कि हजारों लोगों के लिए सम्मानजनक रोजगार का माध्यम भी बन सकती है।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here