
लेखक: अबुआ न्यूज़ झारखंड संपादकीय डेस्क
एक समय था जब किसी शहर की पहचान उसकी सड़कों, बाज़ारों या इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी लाइब्रेरी से होती थी। शहर के बीचों-बीच बनी विशाल पुस्तकालयें ज्ञान, विचार और संस्कृति का केंद्र हुआ करती थीं। छात्र, शिक्षक, लेखक, शोधकर्ता और आम नागरिक घंटों वहाँ बैठकर किताबें पढ़ते थे। लेकिन आज वही लाइब्रेरी कई जगहों पर खाली नज़र आती हैं। सवाल यह है कि आखिर कहाँ गए लाइब्रेरी के वो दिन? क्या लोग सचमुच पुस्तकों से दूर हो रहे हैं?
डिजिटल युग ने हमारी पढ़ने की आदतों को पूरी तरह बदल दिया है। आज जानकारी पाने के लिए लोगों को किताबों की अलमारियों तक जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। मोबाइल फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में जानकारी कुछ सेकंड में स्क्रीन पर उपलब्ध हो जाती है। ऐसे में पुस्तकालयों का महत्व पहले जैसा नहीं रह गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं का बढ़ता स्क्रीन टाइम भी इसके पीछे एक बड़ा कारण है। किताब पढ़ने में धैर्य और एकाग्रता की आवश्यकता होती है, जबकि सोशल मीडिया त्वरित मनोरंजन प्रदान करता है। यही वजह है कि नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग पुस्तकों की बजाय मोबाइल स्क्रीन पर अधिक समय बिताने लगा है। कई सरकारी और शैक्षणिक संस्थान भी इस बात को लेकर चिंतित हैं और छात्रों को दोबारा पुस्तकालयों की ओर आकर्षित करने के प्रयास कर रहे हैं।
हालाँकि यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि किताबों का महत्व खत्म हो गया है। देश के कई हिस्सों में आज भी आधुनिक पुस्तकालय बनाए जा रहे हैं और पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। हाल के वर्षों में कई राज्यों ने नई लाइब्रेरियाँ स्थापित की हैं और पुस्तक मेलों का आयोजन कर युवाओं को पुस्तकों से जोड़ने की कोशिश की है।
केरल जैसे राज्यों का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, जहाँ पढ़ने की संस्कृति को सामाजिक और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। वहाँ पुस्तकालय केवल किताब रखने की जगह नहीं बल्कि सामाजिक जागरूकता और बौद्धिक विकास के केंद्र के रूप में देखे जाते हैं।
असल समस्या पुस्तकों के अस्तित्व की नहीं, बल्कि पढ़ने की आदत के कमजोर होने की है। आज की पीढ़ी जानकारी तो बहुत प्राप्त कर रही है, लेकिन गहराई से पढ़ने और समझने का समय कम होता जा रहा है। पुस्तकें केवल जानकारी नहीं देतीं, बल्कि सोचने, कल्पना करने और तर्क विकसित करने की क्षमता भी बढ़ाती हैं। यही कारण है कि दुनिया भर के शिक्षाविद आज भी पुस्तकों और पुस्तकालयों को शिक्षा की आत्मा मानते हैं।
शायद लाइब्रेरियों के वो पुराने दिन पूरी तरह लौटकर न आएँ, लेकिन यदि समाज पढ़ने की संस्कृति को फिर से अपनाए, तो पुस्तकालय एक बार फिर शहरों की शान बन सकते हैं। आखिर किताबों से दोस्ती केवल ज्ञान नहीं देती, बल्कि इंसान को बेहतर सोचने और समझने की शक्ति भी प्रदान करती है।
निष्कर्ष:
लोग पुस्तकों से पूरी तरह दूर नहीं हुए हैं, लेकिन उनका पढ़ने का तरीका बदल गया है। चुनौती यह है कि डिजिटल दुनिया और पुस्तकों के बीच संतुलन बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ स्क्रीन के साथ-साथ किताबों से भी जुड़ी रहें।



