सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, शादी के बाद अफेयर छिपाने पर नहीं मिलेगी ‘राइट टू प्राइवेसी’ की ढाल

0
73
Share This Post

सुप्रीम कोर्ट ने राइट-टू प्राइवेसी पर बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले निजता के अधिकार का उपयोग शादी के बाद अफेयर के संबंध को छिपाने के लिए नहीं कर सकते हैं।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाला ‘राइट टू प्राइवेसी’ इतना व्यापक नहीं है कि उसका इस्तेमाल पति या पत्नी से जुड़े कथित अफेयर के सबूत छिपाने के लिए किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक या व्यभिचार (Adultery) से जुड़े मामलों में यदि मोबाइल कॉल रिकॉर्ड, होटल में ठहरने का विवरण या अन्य आवश्यक दस्तावेज सच्चाई सामने लाने के लिए जरूरी हों, तो केवल निजता के अधिकार का हवाला देकर उन्हें अदालत में पेश होने से नहीं रोका जा सकता।

शुक्रवार को जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और पति की अपील खारिज कर दी। याचिकाकर्ता पति का तर्क था कि उसके मोबाइल कॉल रिकॉर्ड और होटल में ठहरने से जुड़े दस्तावेज अदालत में मंगाना उसके मौलिक अधिकार और निजता का उल्लंघन है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में आवश्यक साक्ष्य जुटाना ‘राइट टू प्राइवेसी’ का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि ‘राइट टू प्राइवेसी’ (निजता का अधिकार) पूर्ण अधिकार नहीं है। यदि न्याय सुनिश्चित करने और सच्चाई सामने लाने के लिए जरूरी हो, तो अदालत आवश्यक दस्तावेज मंगाने का आदेश दे सकती है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैवाहिक बेवफाई (Adultery) तलाक का वैध आधार है। ऐसे मामलों में केवल निजता का अधिकार बताकर महत्वपूर्ण साक्ष्यों को छिपाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को सही माना था, जिसमें पति के होटल बुकिंग रिकॉर्ड और मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) अदालत में पेश करने का निर्देश दिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है।

क्या है पूरा मामला?

मामला एक दंपति से जुड़ा है, जिनकी शादी 1998 में हुई थी और 2000 में उनकी एक बेटी का जन्म हुआ। पत्नी ने आरोप लगाया कि शादी के दौरान उसके पति का दूसरी महिला से संबंध था और वह उसके साथ जयपुर के एक होटल में भी ठहरा था। इन आरोपों के आधार पर पत्नी ने तलाक की याचिका दायर करते हुए अदालत से पति के होटल बुकिंग रिकॉर्ड और मोबाइल कॉल डिटेल मंगाने की मांग की थी। सबसे पहले फैमिली कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार किया। इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इस आदेश को सही ठहराया। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया में आवश्यक साक्ष्यों को केवल ‘राइट टू प्राइवेसी’ का हवाला देकर रोका नहीं जा सकता।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here