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“सुबह 7 बजे स्कूल, दोपहर 2 बजे छुट्टी: कामकाजी माता-पिता के लिए बढ़ती चुनौती?”

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Abua News Jharkhand Special Report

भारत के अधिकांश स्कूलों में सुबह 7 बजे से लेकर दोपहर 2 बजे तक की कक्षाएं होती हैं। यह व्यवस्था दशकों से चली आ रही है, लेकिन बदलते सामाजिक और आर्थिक माहौल में अब इस पर सवाल उठने लगे हैं। खासकर उन परिवारों में जहां माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं या जहां बच्चे की परवरिश की जिम्मेदारी एक अकेली मां या पिता पर है।

कल्पना कीजिए कि एक बच्चा दोपहर 2 बजे स्कूल से घर लौटता है, जबकि उसके माता-पिता शाम 5 या 6 बजे तक काम पर होते हैं। ऐसे में उस बच्चे की देखभाल कौन करेगा? वह सुरक्षित रहेगा या नहीं? क्या वह मानसिक रूप से अकेलापन महसूस करेगा? ये सवाल आज लाखों परिवारों के सामने खड़े हैं।

बदल रहा है भारतीय परिवार का ढांचा

पहले संयुक्त परिवारों में दादा-दादी, चाचा-चाची या अन्य सदस्य बच्चों की देखभाल कर लेते थे। लेकिन अब शहरों और कस्बों में न्यूक्लियर फैमिली यानी छोटे परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

कामकाजी माता-पिता के लिए सबसे बड़ी चिंता यही होती है कि स्कूल से लौटने के बाद बच्चा किसके साथ रहेगा। कई परिवारों को मजबूरी में घरेलू सहायकों, पड़ोसियों या ट्यूशन का सहारा लेना पड़ता है।

सबसे ज्यादा प्रभावित कौन?

1. एकल माताएं (Single Mothers)

जो महिलाएं अकेले बच्चों का पालन-पोषण कर रही हैं, उनके लिए यह स्थिति और भी कठिन हो जाती है। कार्यस्थल से तुरंत घर लौटना संभव नहीं होता।

2. निम्न और मध्यम वर्गीय परिवार

हर परिवार डे-केयर या निजी देखभाल सेवाओं का खर्च नहीं उठा सकता।

3. छोटे बच्चे

कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों को अकेला छोड़ना सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य दोनों दृष्टि से उचित नहीं माना जाता।

बच्चे क्यों महसूस करते हैं असुरक्षित?

विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक अकेले रहने वाले बच्चों में:

  • असुरक्षा की भावना बढ़ सकती है।
  • मोबाइल और इंटरनेट का अनियंत्रित उपयोग बढ़ सकता है।
  • पढ़ाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • भावनात्मक अकेलापन विकसित हो सकता है।
  • गलत संगत या ऑनलाइन खतरों का जोखिम बढ़ सकता है।

क्या किया जा सकता है?

1. आफ्टर-स्कूल केयर सेंटर

स्कूल परिसर में ही 4 या 5 बजे तक निगरानी में बच्चों के लिए अध्ययन, खेल और गतिविधियों की व्यवस्था की जा सकती है।

2. स्कूल समय पर पुनर्विचार

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में स्कूल समय को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अधिक लचीला बनाया जा सकता है।

3. सामुदायिक बाल देखभाल केंद्र

नगर निकाय और स्थानीय प्रशासन सुरक्षित सामुदायिक केंद्र विकसित कर सकते हैं।

4. कार्यस्थलों पर परिवार-अनुकूल नीतियां

कंपनियां फ्लेक्सी टाइम, वर्क फ्रॉम होम या माता-पिता के लिए विशेष सुविधाएं प्रदान कर सकती हैं।

5. सरकारी नीति

शिक्षा विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग संयुक्त रूप से ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं जो बच्चों की सुरक्षा और माता-पिता की जरूरतों दोनों को ध्यान में रखे।

केवल समय नहीं, सामाजिक बदलाव का मुद्दा

यह बहस केवल स्कूल के समय की नहीं है। यह बदलते भारतीय समाज, महिलाओं की बढ़ती कार्यभागीदारी और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा है।

आज जब देश महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, तब बच्चों की देखभाल की व्यवस्था पर भी उतना ही गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक का स्कूल समय कई परिवारों के लिए सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन लाखों कामकाजी माता-पिता, विशेषकर एकल माताओं और छोटे बच्चों वाले परिवारों के लिए यह एक वास्तविक चुनौती बन चुका है। आने वाले समय में स्कूल, सरकार और समाज को मिलकर ऐसे समाधान खोजने होंगे, जिससे बच्चों की सुरक्षा और माता-पिता की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाया जा सके।

क्योंकि बच्चों की शिक्षा जितनी महत्वपूर्ण है, उनकी सुरक्षा और भावनात्मक देखभाल भी उतनी ही जरूरी है।

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