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BRICS Summit 2026: दिल्ली में दुनिया की बड़ी ताकतों का जमावड़ा, भारत के लिए क्यों बेहद अहम है यह शिखर सम्मेलन?
INDIAInternational

BRICS Summit 2026: दिल्ली में दुनिया की बड़ी ताकतों का जमावड़ा, भारत के लिए क्यों बेहद अहम है यह शिखर सम्मेलन?

By Team Abua
September 11, 2026 9 Min Read
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नई दिल्ली: भारत एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में है। नई दिल्ली में आयोजित हो रहे 18वें BRICS शिखर सम्मेलन ने दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और BRICS के अन्य सदस्य देशों के शीर्ष नेताओं की भागीदारी के कारण यह सम्मेलन केवल एक बहुपक्षीय बैठक नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका का भी संकेत बन गया है।

भारत इस बार BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। ऐसे समय में जब दुनिया कई स्तरों पर तनाव से गुजर रही है—युद्ध और भू-राजनीतिक टकराव जारी हैं, अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा बनी हुई है, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता है, ऊर्जा सुरक्षा बड़ी चुनौती है और विकासशील देश अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं—BRICS Summit का भारत में होना खास महत्व रखता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस सम्मेलन से भारत को क्या हासिल हो सकता है? पुतिन और शी जिनपिंग जैसे नेताओं का भारत आना क्यों महत्वपूर्ण है और BRICS आने वाले वर्षों में भारत की विदेश नीति, व्यापार और वैश्विक प्रभाव को किस तरह प्रभावित कर सकता है?

BRICS अब केवल पांच देशों का समूह नहीं

BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के समूह के रूप में हुई थी। बाद में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद इसे BRICS नाम मिला। बीते कुछ वर्षों में संगठन का तेजी से विस्तार हुआ और कई नई उभरती अर्थव्यवस्थियां इससे जुड़ीं।

विस्तार के बाद BRICS का आर्थिक और राजनीतिक महत्व पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। इस समूह में दुनिया की बड़ी आबादी, विशाल प्राकृतिक संसाधन, तेल और गैस उत्पादक देश, तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थियां और बड़े उपभोक्ता बाजार शामिल हैं।

इसी कारण BRICS को अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं माना जा रहा। इसे दुनिया में बदलते शक्ति संतुलन और Global South की बढ़ती आवाज के रूप में भी देखा जा रहा है।

भारत के लिए BRICS की खासियत यह है कि इस मंच पर वह ऐसे देशों के साथ भी बैठता है जिनके साथ उसके बेहद करीबी संबंध हैं और ऐसे देशों के साथ भी जिनसे गंभीर मतभेद मौजूद हैं।

पुतिन की मौजूदगी क्यों महत्वपूर्ण?

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी भारत-रूस संबंधों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।

भारत और रूस के रिश्ते दशकों पुराने हैं। रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों की मजबूत साझेदारी रही है। बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने संबंध बनाए रखे हैं।

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया। अमेरिका और यूरोप ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए रूस के साथ संवाद और व्यापार जारी रखा।

रूस से भारत की ऊर्जा खरीद भी इसी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।

पुतिन की भारत यात्रा इसलिए भी संदेश देती है कि नई दिल्ली अपनी विदेश नीति किसी एक वैश्विक शक्ति के हिसाब से तय नहीं करना चाहती। भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत कर सकता है, यूरोप के साथ व्यापार बढ़ा सकता है और साथ ही रूस के साथ अपनी पुरानी साझेदारी को भी कायम रख सकता है।

इसे भारत की Strategic Autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति के रूप में देखा जाता है।

शी जिनपिंग की भारत यात्रा पर भी दुनिया की नजर

BRICS Summit में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भागीदारी भी बेहद महत्वपूर्ण है। भारत और चीन दुनिया की दो बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्थाओं वाले देश हैं। दोनों BRICS के महत्वपूर्ण सदस्य हैं, लेकिन दोनों के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी लंबे समय से मौजूद है।

2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए थे। सीमा पर तनाव का असर दोनों देशों के राजनीतिक रिश्तों पर भी पड़ा।

हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की कोशिशें हुई हैं। ऐसे में नई दिल्ली में मोदी और शी जिनपिंग के बीच होने वाली बातचीत पर स्वाभाविक रूप से पूरी दुनिया की नजर रहेगी।

भारत के लिए चीन के साथ रिश्तों में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा सीमा पर शांति और स्थिरता है। नई दिल्ली लगातार यह स्पष्ट करती रही है कि सीमा पर शांति के बिना द्विपक्षीय संबंध सामान्य तरीके से आगे नहीं बढ़ सकते।

दूसरी ओर चीन भारत का बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर उपकरण, औद्योगिक सामान और कई महत्वपूर्ण सप्लाई चेन में चीन की बड़ी भूमिका है।

इसलिए भारत के सामने चुनौती दोहरी है—सीमा और सुरक्षा से जुड़े हितों की रक्षा भी करनी है और आर्थिक वास्तविकताओं को भी ध्यान में रखना है।

BRICS दोनों देशों को ऐसा मंच देता है जहां मतभेदों के बावजूद बातचीत जारी रखी जा सकती है।

भारत की Multi-Alignment Diplomacy

BRICS Summit भारत की विदेश नीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता को सामने लाता है—Multi-Alignment।

आज भारत केवल किसी एक शक्ति केंद्र के साथ खड़ा होने की नीति नहीं अपनाता। भारत अमेरिका के साथ QUAD में काम करता है, रूस के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखता है, BRICS में चीन के साथ बैठता है, यूरोप के साथ व्यापार और तकनीकी साझेदारी बढ़ाता है और मध्य पूर्व के देशों के साथ ऊर्जा तथा निवेश संबंध मजबूत करता है।

यही भारत की मौजूदा विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत भी है।

भारत की कोशिश है कि दुनिया चाहे कितने भी अलग-अलग खेमों में बंटे, नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर हर महत्वपूर्ण देश के साथ संबंध बनाए रखे।

BRICS भारत को इसी संतुलन को आगे बढ़ाने का बड़ा मंच उपलब्ध कराता है।

Global South की आवाज बनने का अवसर

भारत पिछले कुछ वर्षों से खुद को Global South, यानी विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मजबूत आवाज के रूप में पेश कर रहा है।

अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और दुनिया के कई विकासशील देशों की लंबे समय से शिकायत रही है कि वैश्विक संस्थाओं में उनकी आबादी और आर्थिक महत्व के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, IMF और World Bank जैसी संस्थाओं में सुधार की मांग इसी बहस का हिस्सा है।

भारत चाहता है कि वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों को ज्यादा प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की बड़ी भूमिका मिले।

BRICS इस दिशा में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बन सकता है। समूह में शामिल देशों की बढ़ती संख्या Global South की सामूहिक आवाज को और मजबूत कर सकती है।

क्या BRICS डॉलर को चुनौती देगा?

BRICS को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा डॉलर की होती है। अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या BRICS देश मिलकर अमेरिकी डॉलर का विकल्प तैयार करने जा रहे हैं?

वास्तविकता इससे ज्यादा जटिल है।

BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय भुगतान को आसान बनाने पर चर्चा होती रही है। इसका उद्देश्य यह है कि सदस्य देशों के बीच होने वाले हर व्यापार के लिए डॉलर पर पूरी तरह निर्भर रहने की आवश्यकता कम हो।

भारत के लिए यह विषय महत्वपूर्ण है, क्योंकि रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार बढ़ने से कुछ परिस्थितियों में लेन-देन आसान हो सकता है और विदेशी मुद्रा से जुड़े जोखिम कम हो सकते हैं।

लेकिन एक साझा BRICS मुद्रा बनाना बेहद कठिन प्रक्रिया है। सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं, मौद्रिक नीतियां और राजनीतिक हित एक-दूसरे से काफी अलग हैं।

इसलिए फिलहाल ज्यादा व्यावहारिक संभावना स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को मजबूत करने की है।

व्यापार के लिए कितना महत्वपूर्ण है BRICS?

भारत के लिए BRICS का एक बड़ा पहलू व्यापार और निवेश है।

BRICS के भीतर विशाल बाजार मौजूद है। चीन दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। रूस ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों की बड़ी शक्ति है। ब्राजील कृषि और खनिज संसाधनों में महत्वपूर्ण है। दक्षिण अफ्रीका अफ्रीकी महाद्वीप की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। नए सदस्यों के जुड़ने से ऊर्जा और मध्य पूर्व के बाजारों का महत्व भी बढ़ा है।

भारत फार्मास्यूटिकल्स, डिजिटल टेक्नोलॉजी, IT सेवाओं, ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग, कृषि उत्पाद, अंतरिक्ष तकनीक और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में BRICS देशों के साथ सहयोग बढ़ा सकता है।

यदि सदस्य देशों के बीच व्यापारिक बाधाएं कम होती हैं, भुगतान व्यवस्था सरल होती है और सप्लाई चेन सहयोग बढ़ता है, तो भारतीय कंपनियों के लिए नए बाजार खुल सकते हैं।

ऊर्जा सुरक्षा में भारत को फायदा

भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में शामिल है और उसकी ऊर्जा जरूरत लगातार बढ़ रही है।

BRICS में रूस, ईरान और UAE जैसे बड़े ऊर्जा उत्पादक देशों की मौजूदगी भारत के लिए महत्वपूर्ण है।

भारत की अर्थव्यवस्था को तेज गति से आगे बढ़ाने के लिए स्थिर और किफायती ऊर्जा आपूर्ति जरूरी है। तेल और गैस की कीमतों में अचानक वृद्धि का सीधा असर महंगाई, परिवहन लागत और आम उपभोक्ता पर पड़ता है।

इसलिए BRICS के भीतर ऊर्जा सहयोग भारत के आर्थिक हितों से सीधे जुड़ा हुआ है।

तकनीक और डिजिटल अर्थव्यवस्था भी एजेंडे में

भारत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में दुनिया के सामने एक महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में उभरा है। UPI, डिजिटल भुगतान और डिजिटल पहचान से जुड़े भारतीय अनुभव की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होती रही है।

BRICS के जरिए भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था, फिनटेक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा और स्टार्टअप सहयोग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है।

अगर BRICS देशों के बीच तकनीकी सहयोग बढ़ता है तो भारतीय स्टार्टअप और टेक कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

BRICS के भीतर चुनौतियां भी बड़ी

BRICS का विस्तार इसकी ताकत बढ़ाता है, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी बढ़ती हैं।

सभी सदस्य देशों के हित एक जैसे नहीं हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है। रूस के पश्चिमी देशों के साथ गंभीर तनाव हैं। मध्य पूर्व के सदस्य देशों के अपने क्षेत्रीय हित हैं। कई देशों की अमेरिका और यूरोप के साथ साझेदारी भी बेहद महत्वपूर्ण है।

इसलिए BRICS को एक राजनीतिक या सैन्य गठबंधन के रूप में देखना सही नहीं होगा।

भारत की कोशिश BRICS को ऐसा मंच बनाए रखने की है जहां आर्थिक विकास, व्यापार, तकनीक, जलवायु, स्वास्थ्य, ऊर्जा सुरक्षा और Global South से जुड़े मुद्दों पर व्यावहारिक सहयोग हो सके।

भारत के लिए यह भी जरूरी है कि BRICS किसी एक देश के प्रभाव वाला मंच न बने।

विशेष रूप से चीन की विशाल अर्थव्यवस्था के कारण संगठन के भीतर शक्ति संतुलन भारत के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा।

आम भारतीय के लिए BRICS का क्या मतलब?

विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन अक्सर आम लोगों को दूर की चीज लगते हैं, लेकिन इनके आर्थिक फैसलों का असर आखिरकार आम नागरिक तक पहुंच सकता है।

यदि BRICS के जरिए भारत का निर्यात बढ़ता है, नए बाजार खुलते हैं, ऊर्जा की आपूर्ति बेहतर होती है, विदेशी निवेश आता है, भारतीय कंपनियों को नए अवसर मिलते हैं और तकनीकी सहयोग बढ़ता है तो इसका असर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।

इसी तरह ऊर्जा कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थिरता का असर पेट्रोलियम उत्पादों, परिवहन और महंगाई तक पहुंच सकता है।

हालांकि केवल सम्मेलन होने से ये लाभ अपने आप नहीं मिलेंगे। असली परीक्षा इस बात की होगी कि बैठक में बनी सहमति को सदस्य देश जमीन पर कितनी तेजी से लागू करते हैं।

भारत के लिए BRICS 2026 का सबसे बड़ा संदेश

नई दिल्ली में दुनिया के प्रभावशाली नेताओं का एक साथ जुटना अपने आप में भारत के बढ़ते कूटनीतिक महत्व को दिखाता है।

रूस के साथ दोस्ती, चीन के साथ संवाद, अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, यूरोप के साथ आर्थिक संबंध और Global South के नेतृत्व की महत्वाकांक्षा—भारत इन सभी रास्तों पर एक साथ आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है।

यही BRICS Summit 2026 में भारत की भूमिका को खास बनाता है।

भारत के सामने अवसर भी बड़ा है और चुनौती भी। उसे BRICS को पश्चिम विरोधी मंच बनने देने के बजाय आर्थिक सहयोग और विकासशील देशों की आवाज के रूप में आगे बढ़ाना होगा। साथ ही चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच संगठन में संतुलन बनाए रखना होगा।

नई दिल्ली में होने वाली बैठकों, द्विपक्षीय मुलाकातों और संयुक्त घोषणाओं के बाद ही स्पष्ट होगा कि सम्मेलन से ठोस रूप से क्या निकलता है।

लेकिन एक बात स्पष्ट है—BRICS अब वैश्विक राजनीति में नजरअंदाज किया जाने वाला मंच नहीं है और भारत इसके केंद्र में अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

आज जब दुनिया अमेरिका, चीन, रूस और अन्य शक्ति केंद्रों के बीच नए संतुलन की तलाश कर रही है, भारत का संदेश भी साफ दिखाई देता है—

भारत किसी एक खेमे की राजनीति तक सीमित रहने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर दुनिया की सभी प्रमुख शक्तियों से संवाद और सहयोग का रास्ता खुला रखना चाहता है।

और यही BRICS Summit 2026 का भारत के लिए सबसे बड़ा कूटनीतिक अर्थ है।

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