Raksha Bandhan 2026: झारखंड में भाई ही नहीं, पेड़ों की कलाई पर भी बंधती है राखी; जानें अनोखी परंपरा

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सुनसुनिया जंगल में महिलाएं साल के पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधकर लेती हैं संरक्षण का संकल्प, मांदर-धमसे की थाप पर मनता है पर्व

रांची: रक्षाबंधन को आमतौर पर भाई-बहन के अटूट प्रेम और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प से जुड़े पर्व के रूप में जाना जाता है। लेकिन झारखंड में इस त्योहार का एक ऐसा रूप भी देखने को मिलता है, जहां रक्षा सूत्र सिर्फ भाई की कलाई पर नहीं, बल्कि पेड़ों को भी बांधा जाता है। इस साल रक्षाबंधन 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया प्रखंड स्थित सुनसुनिया जंगल में इस दिन प्रकृति संरक्षण से जुड़ी खास परंपरा निभायी जाती है।

साल के पेड़ों को राखी बांधती हैं महिलाएं

रक्षाबंधन के अवसर पर बड़ी संख्या में महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सुनसुनिया जंगल पहुंचती हैं। यहां वे जंगल के साल के पेड़ों को राखी बांधकर उनकी रक्षा का संकल्प लेती हैं। इस परंपरा का नेतृत्व पद्मश्री जमुना टुडू करती हैं। स्थानीय महिलाओं के लिए जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं है, बल्कि उनकी जिंदगी, आजीविका और सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं का अहम हिस्सा है।

मांदर-धमसे की थाप पर मनता है उत्सव

रक्षाबंधन के दिन सुनसुनिया जंगल में पारंपरिक उत्सव का माहौल देखने को मिलता है। महिलाएं लोकगीत गाते हुए जंगल पहुंचती हैं। मांदर और धमसे की थाप पर पारंपरिक नृत्य होता है और इसके बाद पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधा जाता है। इस दौरान आदिवासी संस्कृति और लोक परंपरा की खूबसूरत झलक देखने को मिलती है। आयोजन में वन विभाग के अधिकारी भी शामिल होते हैं।

राखी के बाद पेड़ों की होती है आरती

पेड़ों को राखी बांधने के बाद महिलाएं उनकी आरती भी उतारती हैं। यह रस्म प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके संरक्षण की भावना को दर्शाती है। ग्रामीण समुदाय के लिए यह सिर्फ एक दिन का आयोजन नहीं है। जंगल को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों और पेड़ों की अवैध कटाई को रोकने के लिए स्थानीय लोग लगातार सजग रहते हैं।

रक्षा सूत्र का भाव प्रकृति तक पहुंचा

धार्मिक मान्यताओं में रक्षा सूत्र को सुरक्षा, मंगलकामना और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। सामान्य तौर पर रक्षाबंधन पर बहन भाई को तिलक लगाकर आरती करती है और उसकी कलाई पर राखी बांधती है। झारखंड की यह परंपरा इसी ‘रक्षा’ के भाव को प्रकृति तक विस्तार देती है। पेड़ों को राखी बांधना जंगलों को बचाने और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संदेश भी देता है।

राखी की थाली में क्या-क्या होता है?

ग्रामीण इलाकों में रक्षाबंधन की पूजा की थाली में आमतौर पर राखी, रोली या कुमकुम, अक्षत, दीपक और मिठाई रखी जाती है। बहन भाई को तिलक लगाकर आरती करती है और राखी बांधती है। इसके बदले भाई बहन के सम्मान और सुरक्षा का संकल्प लेते हुए उसे उपहार देता है।

परंपरा में छिपा है पर्यावरण संरक्षण का संदेश

झारखंड की पहचान उसके घने जंगलों और प्रकृति से गहरे जुड़े आदिवासी जीवन से रही है। ऐसे में सुनसुनिया जंगल की यह रक्षाबंधन परंपरा धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी जोड़ती है।

यह परंपरा संदेश देती है कि रक्षा का भाव केवल इंसानी रिश्तों तक सीमित नहीं होना चाहिए। जिन पेड़ों और जंगलों से जीवन जुड़ा है, उनकी रक्षा भी उतनी ही जरूरी है। यही वजह है कि झारखंड का यह अनोखा रक्षाबंधन समारोह देश के दूसरे हिस्सों से अलग अपनी खास पहचान बनाता है।

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