होर्मुज़ में बढ़ा तनाव: ईरान पहुंचा रूस का ‘डूम्सडे प्लेन’, क्या दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध की ओर बढ़ रही है?

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रांची : पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ एक बार फिर वैश्विक शक्ति संघर्ष का केंद्र बन गया है। इसी बीच रूस के विशेष एयरबोर्न कमांड विमान, जिसे आम तौर पर “डूम्सडे प्लेन” कहा जाता है, के ईरान पहुंचने की खबर ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

तनाव उस समय और बढ़ गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय कार्गो पर अमेरिका 20 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा। ट्रंप का कहना है कि इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा अमेरिकी सेना कर रही है, इसलिए इसका लाभ उठाने वाले देशों को इसकी कीमत चुकानी चाहिए। इसके साथ ही अमेरिका ने ईरानी जहाजों और ईरान से कारोबार करने वाले जहाजों पर नाकेबंदी दोबारा लागू करने की बात भी कही है। इस फैसले ने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार में नई चिंता पैदा कर दी है।

क्यों महत्वपूर्ण है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग माना जाता है। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों का तेल और एलएनजी इसी मार्ग से एशिया और यूरोप पहुंचता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मार्ग पर अतिरिक्त टैरिफ या प्रतिबंध लागू होते हैं, तो समुद्री परिवहन की लागत, बीमा प्रीमियम और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।

तेल बाजार में दिखा असर

ट्रंप की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई। ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया। इसका असर भारत जैसे तेल आयातक देशों की अर्थव्यवस्था और ईंधन कीमतों पर भी पड़ सकता है।

ईरान पहुंचा रूस का ‘डूम्सडे प्लेन’

इसी बीच रूस का विशेष एयरबोर्न कमांड विमान ईरान पहुंचा है। हालांकि यह रूस का मुख्य परमाणु युद्ध कमांड विमान नहीं माना जाता, बल्कि सुरक्षित संचार और उच्चस्तरीय सैन्य कमांड के लिए उपयोग किया जाने वाला विशेष विमान है।

इस विमान की ईरान में मौजूदगी को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह रूस और ईरान के बीच रणनीतिक समन्वय का संकेत हो सकता है, जबकि अन्य इसे रूसी अधिकारियों की सुरक्षित यात्रा से जोड़कर देख रहे हैं।

आधिकारिक पुष्टि नहीं

फिलहाल रूस या ईरान की ओर से इस विमान की तैनाती के उद्देश्य को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए इसके वास्तविक मिशन को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता और महाशक्तियों की सक्रियता ने वैश्विक स्तर पर चिंता जरूर बढ़ा दी है। आने वाले दिनों में इस क्षेत्र की घटनाओं पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।

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