Mamata Banerjee: बागी विधायकों ने TMC अध्यक्ष पद से हटाया, 65 विधायकों का समर्थन, अब क्या हैं विकल्प

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Mamata Banerjee को बागियों ने क्यों हटाया?

पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री Mamata Banerjee को तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी गुट ने सोमवार को पार्टी अध्यक्ष पद से हटा दिया। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बागियों ने कोलकाता में एक विशेष सत्र बुलाकर यह फैसला किया। बागियों ने पूर्व मंत्री अरूप रॉय को सर्वसम्मति से नया अध्यक्ष चुना।

यह कदम पार्टी संविधान के अनुच्छेद 20 का हवाला देकर उठाया गया, जिसके अनुसार राष्ट्रीय कार्यसमिति का गठन हर तीन साल में होना चाहिए। बागियों का दावा है कि पिछली कार्यसमिति का कार्यकाल 11 फरवरी 2025 को समाप्त हो गया था, जिसके बाद कोई नई समिति नहीं बनी।

विद्रोह के पीछे क्या वजहें हैं?

TMC में यह विद्रोह मई 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद शुरू हुआ। भाजपा ने 207 सीटें जीतीं, जबकि TMC को 80 सीटों पर संतोष करना पड़ा। चुनाव में Mamata Banerjee की व्यक्तिगत हार ने पार्टी की छवि को और कमजोर किया।

विद्रोह के कई कारण हैं:

  • संगठनात्मक कमजोरी: TMC ने कभी मजबूत वैचारिक संरचना नहीं बनाई। पार्टी की ताकत Mamata Banerjee के व्यक्तिगत आकर्षण और सत्ता के संसाधनों पर टिकी थी।
  • स्थानीय सरदारों का उभार: सत्ता में रहते हुए Mamata Banerjee ने स्थानीय नेताओं को काफी स्वायत्तता दी थी। सत्ता खोने के बाद ये नेता असुरक्षित हो गए।
  • परिवारवादAbhishek Banerjee को उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करने के प्रयासों से कई नेताओं में नाराजगी थी।
  • भाजपा का विकल्प: केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा की उपस्थिति ने बागियों को एक वैकल्पिक सत्ता केंद्र उपलब्ध कराया।

नई नेतृत्व टीम में कौन-कौन शामिल?

बागी गुट ने अपनी नई राष्ट्रीय कार्यसमिति की घोषणा की है:

पदनाम
अध्यक्षअरूप रॉय
उपाध्यक्षफिरहाद हकीम, अरूप बिस्वास, रथिन घोष, सबीना यासमीन
महासचिवऋतब्रत बनर्जी, जावेद खान, संदीपन साहा
कोषाध्यक्षअखरुज्जमान अंसारी

दिलचस्प बात यह है कि बागियों ने मंच पर Mamata Banerjee की तस्वीर नहीं लगाई। वहां महात्मा गांधी, भीमराव अंबेडकर, रवींद्रनाथ टैगोर और काजी नजरुल इस्लाम की तस्वीरें थीं।

Mamata Banerjee के पास क्या विकल्प हैं?

Mamata Banerjee के सामने कई कठिन विकल्प हैं:

  1. कानूनी लड़ाई: वे अदालत में बागियों की कार्रवाई को चुनौती दे सकती हैं। यह मामला संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) और पार्टी संविधान की व्याख्या पर निर्भर करेगा।
  2. चुनाव आयोग में दावा: दोनों गुट चुनाव आयोग के समक्ष ‘असली TMC’ होने का दावा करेंगे। आयोग आमतौर पर विधायी और संगठनात्मक बहुमत के आधार पर फैसला करता है।
  3. पुनर्निर्माण: वे पार्टी को फिर से संगठित करने का प्रयास कर सकती हैं। हालांकि, पार्टी के अधिकांश विधायकों (58-65) और 20 सांसदों के अलग हो जाने के बाद यह मुश्किल है।
  4. चुनाव चिह्न की लड़ाई: चुनाव चिह्न ‘जोड़ा घास फूल’ पर दावा करना एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि आमतौर पर बहुमत वाले गुट को ही चिह्न मिलता है।

पार्टी के 80 विधायकों में से 65 ने बागी गुट का समर्थन किया है, जबकि 14 Mamata Banerjee के साथ हैं। संसद में 28 में से 20 सांसदों ने अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय कर लिया है और NDA का समर्थन कर रहे हैं।

चुनाव चिह्न किसे मिलेगा?

Mamata Banerjee के लिए चुनाव चिह्न की लड़ाई आसान नहीं होगी। चुनाव आयोग आमतौर पर उसी गुट को चिह्न आवंटित करता है, जिसके पास विधायकों या सांसदों का बहुमत होता है। बागी गुट के पास 65 विधायकों का बहुमत है, जो Mamata Banerjee के 14 विधायकों से कहीं अधिक है। पहले शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) और एनसीपी (अजित पवार गुट) में भी ऐसी ही स्थिति में बहुमत वाले गुट को ही चिह्न मिला था।

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