सिर्फ एक तौलिया नहीं, सत्ता का प्रतीक: क्या सरकारी कुर्सियों से VIP संस्कृति हटेगी?
The White Towel on Power: Can India Finally Move Beyond VIP Culture?
भारत में कुछ चीजें इतनी स्थायी हैं कि वे संविधान के अनुच्छेदों से भी ज्यादा टिकाऊ लगती हैं। उनमें से एक है सरकारी कुर्सियों पर पड़ा वह सफेद तौलिया, जिसे देखकर आम आदमी समझ जाता है कि यहां कोई “बड़ा साहब” बैठता है।
हाल ही में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने अपने कार्यालय से इस सफेद तौलिया संस्कृति को हटाकर बहस छेड़ दी। सवाल सिर्फ तौलिये का नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का है जो सत्ता और जनता के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी करती है।
यह तौलिया आखिर है क्या? पसीना रोकने का साधन, सफाई का प्रतीक, या फिर पद और प्रतिष्ठा का मूक विज्ञापन?
नौकरशाही की गलियों में वर्षों से यह एक अनलिखा प्रोटोकॉल बन चुका है। कुर्सी पर जितना बड़ा तौलिया, उतना बड़ा अधिकारी। जैसे किसी जंगल में शेर अपनी दहाड़ से पहचान बनाता है, वैसे ही कई दफ्तरों में तौलिया अधिकार का झंडा बन जाता है।
विडंबना देखिए। लोकतंत्र में कुर्सी जनता की सेवा के लिए होती है, लेकिन कभी-कभी वही कुर्सी और उसका तौलिया जनता से दूरी का प्रतीक बन जाते हैं। फाइलों के ढेर, बंद कमरे और सफेद तौलिये वाली कुर्सियां आम नागरिक को यह एहसास दिलाती हैं कि वह किसी सेवा केंद्र में नहीं, बल्कि किसी दरबार में प्रवेश कर रहा है।
सवाल यह नहीं कि तौलिया रहे या हटे। सवाल यह है कि क्या तौलिया हटाने के साथ-साथ वह सोच भी बदलेगी जो पद को सेवा नहीं, विशेषाधिकार मानती है?
अगर तौलिया सिर्फ कपड़ा है, तो उसके हटने या रहने से फर्क नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन अगर वह एक मानसिक प्रतीक है, तो फिर उसे हटाना केवल फर्नीचर बदलना नहीं, बल्कि व्यवस्था के चरित्र को बदलने की शुरुआत हो सकती है।
अंतिम बात
शायद असली सुधार तब होगा, जब सरकारी दफ्तरों में कुर्सी पर रखा तौलिया नहीं, बल्कि नागरिक के चेहरे की मुस्कान अधिकारी की पहचान बनेगी।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा VIP कोई अधिकारी नहीं, बल्कि जनता होती है। ✍️


