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क्या दुनिया कुछ बड़े नेताओं के हाथों में सिमट गई है? क्या आम लोग सिर्फ तमाशबीन बनकर रह गए हैं?

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दुनिया के बड़े फैसले आज कुछ शक्तिशाली देशों, नेताओं और कॉरपोरेट ताकतों के इर्द-गिर्द घूमते दिखाई देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है—क्या आम आदमी की आवाज़ कमजोर पड़ गई है, या लोकतंत्र अब भी उतना ही मजबूत है जितना हम मानते हैं? पढ़िए अबुआ न्यूज झारखंड का विशेष संपादकीय।

संपादकीय

आज जब हम दुनिया की ओर देखते हैं तो एक सवाल बार-बार मन में उठता है—क्या वास्तव में दुनिया कुछ बड़े नेताओं और शक्तिशाली देशों के हाथों में सिमटती जा रही है? क्या आम नागरिक केवल खबरें देखने, सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने और परिणाम भुगतने तक सीमित हो गया है?

यूक्रेन युद्ध हो, गाजा संकट हो, ईरान-इज़राइल तनाव हो या वैश्विक आर्थिक फैसले—अक्सर ऐसा लगता है कि निर्णय कुछ कमरों में लिए जाते हैं, लेकिन उनका असर करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ता है। महंगाई बढ़ती है, नौकरियां प्रभावित होती हैं, बाजार गिरते हैं और आम जनता इसकी कीमत चुकाती है।

इतिहास में कभी राजा-महाराजा और साम्राज्य जनता के भाग्य का फैसला करते थे। आज लोकतंत्र का युग है, लेकिन क्या सत्ता का केंद्रीकरण वास्तव में खत्म हुआ है? या उसने केवल अपना रूप बदल लिया है?

आज राजनीतिक शक्ति के साथ-साथ आर्थिक और तकनीकी शक्ति भी कुछ हाथों में केंद्रित होती दिखाई देती है। दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां अरबों लोगों तक सूचना पहुंचाने और रोकने की क्षमता रखती हैं। बड़े देशों की नीतियां छोटे देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं। वैश्विक संस्थानों के फैसले दूर-दराज के गांवों तक असर छोड़ते हैं।

ऐसे में कई लोगों को लगता है कि वे स्वतंत्र होकर भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं। उनकी जिंदगी पर असर डालने वाले कई फैसलों में उनकी सीधी भागीदारी नहीं होती।

लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि हम गुलाम हैं?

शायद नहीं।

गुलामी केवल जंजीरों से नहीं होती और आजादी केवल मतदान करने का अधिकार नहीं है। असली आजादी विचारों की स्वतंत्रता, सवाल पूछने की क्षमता और सत्ता को जवाबदेह बनाने में निहित है।

अगर पत्रकारिता स्वतंत्र है, न्यायपालिका निष्पक्ष है, नागरिक समाज सक्रिय है और जनता जागरूक है, तो कोई भी शक्ति पूरी तरह निरंकुश नहीं हो सकती। इतिहास गवाह है कि जनता की आवाज़ ने बड़े-बड़े साम्राज्यों को झुकाया है और शक्तिशाली नेताओं को जवाब देने पर मजबूर किया है।

आज चुनौती यह नहीं है कि दुनिया में शक्तिशाली लोग हैं। चुनौती यह है कि क्या आम लोग अपनी शक्ति को पहचानते हैं? क्या वे केवल दर्शक बने रहेंगे या लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी निभाएंगे?

सोशल मीडिया के दौर में हर व्यक्ति के पास अपनी बात रखने का मंच है। सवाल यह है कि हम उस मंच का उपयोग सोच-समझकर करते हैं या नहीं। अगर नागरिक जागरूक रहें, सवाल पूछते रहें और सच्चाई जानने का प्रयास करें, तो लोकतंत्र की ताकत बनी रहेगी।

दुनिया में शक्तिशाली नेता हमेशा रहेंगे। बड़े देश भी रहेंगे। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली ताकत जनता होती है। जब जनता चुप हो जाती है, तब सत्ता निरंकुश होती है। और जब जनता जागती है, तब इतिहास बदलता है।

इसलिए शायद सही सवाल यह नहीं है कि “क्या हम गुलाम हैं?” बल्कि यह है कि “क्या हम अपनी आजादी और अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं?”

— अबुआ न्यूज झारखंड संपादकीय डेस्क

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