एक छोटा-सा ई-मेल पी जाता है आधी बोतल पानी, डिजिटल दुनिया का चौंकाने वाला सच

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जिस ई-मेल को भेजने में लगता है सिर्फ एक क्लिक, उसके पीछे छिपी है पानी और बिजली की बड़ी खपत की कहानी

Shocking Report: Sending a Single Email Could Consume as Much Water as Half a Bottle

नई दिल्ली: क्या आपने कभी सोचा है कि “Send” बटन दबाते ही आपका एक साधारण ई-मेल पर्यावरण पर कितना असर डालता है? शायद नहीं। लेकिन एक रिपोर्ट ने डिजिटल दुनिया का ऐसा सच सामने रखा है, जिसने पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।

रिपोर्ट के अनुसार, एक सामान्य ई-मेल को भेजने, स्टोर करने और प्राप्त करने की पूरी प्रक्रिया में इतनी ऊर्जा खर्च होती है कि उसके लिए लगभग आधी बोतल पानी के बराबर संसाधनों की खपत हो सकती है। यह पानी सीधे ई-मेल में नहीं लगता, बल्कि उन विशाल डेटा सेंटरों को ठंडा रखने में उपयोग होता है, जहां दुनिया भर का डिजिटल डेटा संग्रहित और प्रोसेस किया जाता है।

आज हम हर दिन सैकड़ों ई-मेल भेजते हैं। ऑफिस की फाइलें, फोटो, वीडियो, क्लाउड बैकअप, सोशल मीडिया पोस्ट और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बढ़ता उपयोग डेटा सेंटरों पर दबाव बढ़ा रहा है। इन सर्वरों को 24 घंटे चालू रखने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी की जरूरत पड़ती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, दुनिया भर में डेटा सेंटरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। AI तकनीकों और क्लाउड सेवाओं के विस्तार के कारण आने वाले वर्षों में इनकी ऊर्जा और जल खपत और अधिक बढ़ सकती है। कई बड़ी टेक कंपनियां अब अपने डेटा सेंटरों को अधिक ऊर्जा-कुशल और जल-संरक्षण आधारित बनाने की दिशा में काम कर रही हैं।

पर्यावरणविदों का कहना है कि डिजिटल सेवाएं भले ही कागज की बचत करती हों, लेकिन उनका भी एक “कार्बन और वाटर फुटप्रिंट” होता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अनावश्यक ई-मेल, बेकार अटैचमेंट, पुराने डेटा का संग्रह और लगातार बढ़ती डिजिटल गतिविधियां इस दबाव को और बढ़ा रही हैं।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि डिजिटल तकनीक को छोड़ना समाधान नहीं है। बल्कि जरूरत है जिम्मेदार उपयोग की। अनावश्यक ई-मेल हटाना, बेकार डेटा स्टोरेज कम करना और डिजिटल संसाधनों का सोच-समझकर इस्तेमाल करना पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम कर सकता है।

एक क्लिक में भेजा गया ई-मेल भले ही छोटा लगे, लेकिन उसके पीछे चल रही तकनीकी दुनिया की कीमत कहीं अधिक बड़ी है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या हम डिजिटल सुविधा का उपयोग उतनी ही जिम्मेदारी से कर रहे हैं, जितनी तेजी से उसका लाभ उठा रहे हैं?

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