‘Toxic’ में कियारा का सर्कस दिखेगा रंगीन, असलियत में हजारों सीटें खाली; फिर भी कलाकार कहते हैं- शो मस्ट गो ऑन

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40 साल से सर्कस में जोकर का किरदार निभा रहे बिरजू ने बताया बदलते दौर का दर्द, बोले- बच्चों को सर्कस में नहीं आने दिया; एक बेटा फिल्म एडिटर तो दूसरा डॉक्टर

नई दिल्ली: बड़ा सा तंबू… चारों तरफ चमकती रोशनी… स्टेज पर तेज म्यूजिक और कलाकार अपने करतब के लिए पूरी तरह तैयार। लेकिन जैसे ही नजर दर्शकों की तरफ जाती है, पूरी तस्वीर बदल जाती है। हजारों लोगों के बैठने की क्षमता वाले सर्कस में कई बार सिर्फ चार-पांच दर्शक नजर आते हैं।

इसके बावजूद कलाकारों के चेहरे पर शिकन नहीं होती। मेकअप होता है, कॉस्ट्यूम पहना जाता है और शो उसी ऊर्जा के साथ शुरू होता है, जैसे सामने पूरा मैदान दर्शकों से भरा हो। क्योंकि सर्कस की दुनिया में शायद एक नियम आज भी नहीं बदला है—शो मस्ट गो ऑन।

लेकिन सवाल ये है कि आखिर वह सर्कस कहां चला गया, जिसके बाहर टिकट खरीदने के लिए लाइनें लगती थीं? जहां बच्चे अपने माता-पिता के साथ पहुंचते थे और कलाकारों के हर करतब पर तालियों से पूरा तंबू गूंज उठता था?

इसी सवाल का एक दिलचस्प जवाब अब यश की फिल्म ‘Toxic’ के जरिए भी तलाशा जा सकता है। फिल्म में कियारा आडवाणी सर्कस आर्टिस्ट के किरदार में नजर आएंगी। पर्दे पर सर्कस की दुनिया भले ही बेहद खूबसूरत और रोमांचक दिखाई दे, लेकिन जमीन पर इससे जुड़ी कहानी काफी अलग है।

फिल्म के लिए सर्कस बनाना आसान नहीं

‘Toxic’ में सर्कस की दुनिया को पर्दे पर उतारने के लिए मेकर्स ने बड़े स्तर पर तैयारी की। इस सिलसिले में 2024 में रैंबो सर्कस के मालिक सुरजीत से भी बातचीत हुई थी। सिर्फ एक बड़ा टेंट लगाना ही चुनौती नहीं थी। टेंट की डिजाइन, उसका फ्रेम, हवा में उसकी मजबूती और कलाकारों के करतब के दौरान स्ट्रक्चर पर पड़ने वाला दबाव—हर पहलू का ध्यान रखना जरूरी था। बताया गया कि फिल्म के लिए तैयार किया गया सर्कस सेट करीब तीन महीने तक लगाया गया। यानी कैमरे पर कुछ मिनट की कहानी दिखाने के पीछे महीनों की तैयारी और मेहनत लगी।

लेकिन यहां एक बड़ा फर्क है।

फिल्म में सर्कस को दोबारा बनाया जा सकता है, असली सर्कस को दर्शकों के लिए जिंदा रखना कहीं ज्यादा मुश्किल है।

कैमरे के सामने रंगीन, जमीन पर खाली कुर्सियां

फिल्म में कैमरा सर्कस की चमक दिखाता है। रंग-बिरंगी लाइट्स, शानदार सेट, कलाकारों के खतरनाक स्टंट और हजारों दर्शकों का शोर—सब कुछ कहानी का हिस्सा बन जाता है। लेकिन असली सर्कस में आज सबसे बड़ा सवाल है—दर्शक कहां हैं?

करीब चार दशक से सर्कस की दुनिया से जुड़े बिरजू ने इस बदलाव को बेहद करीब से देखा है। उन्होंने अलग-अलग शहरों में सर्कस के साथ सफर किया और सालों तक जोकर बनकर दर्शकों का मनोरंजन किया। लेकिन आज कई बार हालात ऐसे होते हैं कि सामने सिर्फ कुछ दर्शक बैठे होते हैं।

फिर भी कलाकार स्टेज पर जाते हैं। मेकअप करते हैं। कॉस्ट्यूम पहनते हैं। करतब दिखाते हैं। हंसाते हैं।

कुर्सियां खाली हो सकती हैं, लेकिन कलाकार की मेहनत खाली नहीं होती।

40 साल बाद भी एक सवाल- कलाकारों को सम्मान क्यों नहीं?

बिरजू की जिंदगी का एक सवाल इस पूरी कहानी को और गहरा बना देता है।m उनकी बेटी ने उनसे पूछा था—जब आप करीब 40 साल से सर्कस में काम कर रहे हैं और खुद एक कलाकार हैं, तो सर्कस के कलाकारों को दूसरे क्षेत्रों के कलाकारों की तरह सम्मान और अवॉर्ड क्यों नहीं मिलते? फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों के काम को पुरस्कार मिलते हैं। खेल और दूसरे कला क्षेत्रों में भी उपलब्धियों को सम्मान मिलता है। लेकिन सर्कस के कलाकारों की मेहनत अक्सर पर्दे के पीछे ही रह जाती है।

जबकि उनका काम आसान नहीं होता। ऊंचाई पर करतब, संतुलन, जिम्नास्टिक और खतरनाक स्टंट के दौरान कलाकारों को अपने शरीर पर पूरा नियंत्रण रखना पड़ता है। एक छोटी सी गलती गंभीर चोट में बदल सकती है।

चोट लगने के बाद कलाकार का क्या?

सर्कस की चमक के पीछे एक और कड़वी सच्चाई छिपी है—कलाकार का शरीर ही उसकी रोजी-रोटी है।

बिरजू के मुताबिक, सर्कस में काम करते हुए कई कलाकारों को गंभीर चोटें लगीं। किसी के पैर में चोट लगी तो किसी की कमर प्रभावित हुई। कई कलाकार ऐसे भी रहे, जिनके लिए चोट के बाद सामान्य जिंदगी में लौटना मुश्किल हो गया। ऐसे में सवाल सिर्फ इलाज का नहीं है। सवाल यह है कि जब कलाकार अपने शरीर के दम पर काम करने की स्थिति में नहीं रहता, तब उसकी और उसके परिवार की जिम्मेदारी कौन उठाता है?

विदेश में मिली पहचान ने दिलाया अलग एहसास

बिरजू ने अपनी जिंदगी का एक ऐसा अनुभव भी साझा किया, जिसने उन्हें गर्व के साथ-साथ सोचने पर मजबूर किया। एक बार विदेश में उनकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई। बातचीत के दौरान उन्हें पता चला कि उसके घर में एक भारतीय सर्कस कलाकार की तस्वीर लगी हुई है।

बिरजू के लिए यह हैरान करने वाली बात थी। जिस कलाकार को अपने देश में शायद बहुत कम लोग जानते हों, उसकी कला को विदेश में इतनी अहमियत दी जा रही थी कि उसकी तस्वीर घर में सहेजकर रखी गई थी। यह अनुभव उनके लिए खुशी भी था और एक सवाल भी—

अगर भारतीय सर्कस कलाकारों की कला विदेशों में सम्मान पा सकती है, तो अपने देश में उन्हें वह पहचान क्यों नहीं मिलती?

40 साल सर्कस में बिताए, लेकिन बच्चों को इससे दूर रखा

बिरजू की कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास शायद यही है। जिस सर्कस ने उन्हें दशकों तक रोजगार दिया, उसी दुनिया को उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य के लिए नहीं चुना। उन्होंने बच्चों को अपनी पसंद का करियर चुनने की आजादी दी। नतीजा यह हुआ कि आज उनका एक बेटा फिल्म एडिटर है और दूसरा डॉक्टर

बिरजू ने सर्कस से हुई कमाई से अपने बच्चों की पढ़ाई कराई। वह खुद ज्यादा पढ़ नहीं पाए, लेकिन उन्होंने यह तय किया कि उनके बच्चों के पास बेहतर विकल्प जरूर हों। और यही बात सर्कस की मौजूदा स्थिति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है।

जब एक सर्कस कलाकार अपने बच्चों को इस पेशे में नहीं देखना चाहता, तो आने वाली पीढ़ी में इस कला को आगे कौन बढ़ाएगा?

OTT और मोबाइल के दौर में सर्कस की सबसे बड़ी चुनौती

आज मनोरंजन के विकल्प पहले से कहीं ज्यादा हैं। टीवी, फिल्मों, ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने लोगों को घर बैठे मनोरंजन की अनगिनत सुविधाएं दे दी हैं। जिन करतबों को देखने के लिए कभी लोग सर्कस के तंबू तक पहुंचते थे, उनका एक हिस्सा अब मोबाइल स्क्रीन पर आसानी से देखा जा सकता है।

लेकिन लाइव सर्कस का अनुभव अलग है। कलाकार को अपनी आंखों के सामने जोखिम लेते देखना, करतब पूरा होने के बाद तालियों की आवाज और पूरे तंबू में बनता रोमांच—इसे स्क्रीन पूरी तरह दोहरा नहीं सकती। बस जरूरत है कि उन तालियों के लिए दर्शक फिर से तंबू तक पहुंचें।

‘Toxic’ का सर्कस और असली सर्कस की कहानी

जब ‘Toxic’ में कियारा आडवाणी सर्कस आर्टिस्ट के रूप में नजर आएंगी, तो बड़े पर्दे पर दर्शकों को सर्कस की एक भव्य और सिनेमाई दुनिया दिखाई देगी। लेकिन उसी वक्त देश के किसी कोने में शायद कोई असली सर्कस अपना शो शुरू कर चुका होगा। सामने हजारों कुर्सियां होंगी। उनमें से कुछ ही भरी होंगी। स्टेज पर रोशनी होगी। म्यूजिक बजेगा। कलाकार अपना करतब दिखाएगा।

दर्शक कम होंगे, लेकिन कलाकार की मेहनत उतनी ही होगी। और शो खत्म होने के बाद भी सर्कस की दुनिया का सबसे बड़ा सवाल वहीं रहेगा— क्या सर्कस की असली कला को बचाने के लिए सिर्फ कलाकारों का ‘शो मस्ट गो ऑन’ कहना काफी है, या दर्शकों और सिस्टम को भी इस तंबू तक वापस आना होगा?

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