
Ranchi/Abua News Jharkhand: दक्षिण-पश्चिम मानसून ने 4 जून 2026 को केरल में आधिकारिक रूप से दस्तक दे दी है। इसके साथ ही भारत के सबसे महत्वपूर्ण मौसम चक्र की शुरुआत हो चुकी है। भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि, जल संसाधन, बिजली उत्पादन और करोड़ों लोगों की आजीविका काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। यही वजह है कि मानसून का हर कदम देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
हालांकि इस बार मानसून सामान्य तिथि 1 जून की तुलना में लगभग तीन दिन देर से पहुंचा है। मौसम विभाग का कहना है कि यह देरी बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन इसके बावजूद पूरे देश की नजर अब मानसून की रफ्तार और उसकी ताकत पर टिकी हुई है। विशेष रूप से इसलिए क्योंकि इस बार एल नीनो (El Niño) की आशंका मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रही है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार मानसून फिलहाल केरल, तमिलनाडु के कुछ हिस्सों, लक्षद्वीप और दक्षिणी अरब सागर क्षेत्र तक पहुंच चुका है। अगले कुछ दिनों में इसके कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में आगे बढ़ने की संभावना है। सामान्य परिस्थितियों में मानसून जुलाई के पहले सप्ताह तक देश के अधिकांश हिस्सों को कवर कर लेता है।
लेकिन इस बार सबसे बड़ी चर्चा मानसून की मात्रा को लेकर है। मौसम विभाग और कई अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों का अनुमान है कि जून से सितंबर के बीच होने वाली कुल वर्षा सामान्य से कम रह सकती है। अनुमान के अनुसार इस वर्ष मानसून दीर्घकालिक औसत (LPA) के लगभग 90 से 92 प्रतिशत के आसपास रह सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह पिछले कई वर्षों के मुकाबले कमजोर मानसून माना जाएगा।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह चिंता की बात है। देश की लगभग 50 प्रतिशत कृषि भूमि आज भी वर्षा आधारित खेती पर निर्भर है। धान, मक्का, दालें, सोयाबीन, कपास और गन्ना जैसी फसलों की बुवाई मानसून की बारिश के अनुसार होती है। यदि जून और जुलाई में पर्याप्त वर्षा नहीं होती है तो किसानों को बुवाई में देरी करनी पड़ सकती है। वहीं जुलाई और अगस्त में बारिश कम होने पर फसलों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है, जिससे उत्पादन घटने का खतरा पैदा हो सकता है।
झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के लिए मानसून और भी अधिक महत्वपूर्ण है। झारखंड में बड़ी संख्या में किसान अभी भी सिंचाई के लिए प्राकृतिक वर्षा पर निर्भर हैं। राज्य में धान की खेती का बड़ा हिस्सा मानसून पर आधारित है। यदि मानसून समय पर और पर्याप्त मात्रा में वर्षा देता है तो किसानों को बड़ी राहत मिलेगी। लेकिन यदि बारिश कमजोर रही तो बुवाई प्रभावित हो सकती है और कृषि उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
कम बारिश का प्रभाव केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा। देश के बड़े बांधों और जलाशयों में पानी का स्तर भी मानसून पर निर्भर करता है। यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है तो कई राज्यों में पेयजल संकट की स्थिति बन सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्रोत जल्दी सूख सकते हैं और शहरों में भी पानी की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
बिजली क्षेत्र पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। भारत में जल विद्युत उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा बांधों में उपलब्ध पानी पर निर्भर करता है। जल स्तर घटने से बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में बिजली संकट की आशंका भी बढ़ सकती है।
महंगाई भी मानसून से सीधे जुड़ी हुई है। यदि फसल उत्पादन कम होता है तो खाद्यान्न, सब्जियों और दालों की कीमतें बढ़ सकती हैं। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर मानसून की स्थिति में खुदरा महंगाई बढ़ सकती है। इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ेगा। पहले से ही बढ़ती तेल कीमतों और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच खाद्य महंगाई सरकार के लिए नई चुनौती बन सकती है।
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून की असली स्थिति जुलाई और अगस्त के दौरान स्पष्ट होगी। कई बार शुरुआती देरी के बावजूद मानसून बाद में तेजी पकड़ लेता है और वर्षा का घाटा पूरा कर देता है। यदि बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं तो देश के कई हिस्सों में सामान्य या उससे अधिक बारिश भी हो सकती है।
इस समय देश भीषण गर्मी और हीटवेव से जूझ रहा है। उत्तर भारत से लेकर पूर्वी भारत तक तापमान लगातार सामान्य से ऊपर बना हुआ है। ऐसे में करोड़ों लोगों को मानसून से राहत की उम्मीद है। लेकिन इस बार मानसून केवल गर्मी से राहत देने वाला मौसम नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि आने वाले महीनों में किसानों की आय कैसी होगी, महंगाई कितनी बढ़ेगी, जल संकट कितना गंभीर होगा और देश की अर्थव्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ेगी।
फिलहाल मानसून की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि वर्ष 2026 का मानसून देश के लिए राहत की बारिश लेकर आएगा या फिर नई आर्थिक और कृषि चुनौतियों का कारण बनेगा। पूरे देश की निगाहें अब आसमान पर टिकी हैं।


