
गरीबों और वंचितों तक खुद पहुंचे न्याय व्यवस्था, भाषा बने न्याय में बाधा नहीं : CJI सूर्यकांत

Deoghar: भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था का मकसद सिर्फ अदालतों के माध्यम से लोगों तक न्याय पहुंचाना नहीं, बल्कि न्याय से वंचित लोगों तक स्वयं पहुंचकर उनकी समस्याओं का समाधान करना भी है। विधिक सेवा प्राधिकारों को गरीबों और न्याय व्यवस्था के बीच एक मजबूत सेतु की भूमिका निभानी होगी। इसके लिए जरूरी है कि जरूरतमंदों की समस्याएं उनकी अपनी भाषा में सुनी और समझी जाएं, ताकि भाषा, अशिक्षा, आर्थिक तंगी या सामाजिक पिछड़ेपन के कारण कोई भी व्यक्ति न्याय से वंचित न रहे।
गरीबों के लिए 24 घंटे खुले रहें विधिक सेवा संस्थानों के दरवाजे
सीजेआई न्यायमूर्ति सूर्यकांत सोमवार को देवघर सिविल कोर्ट परिसर में आयोजित राज्यस्तरीय विधिक सेवा-सह-सशक्तीकरण शिविर को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर लोगों के लिए विधिक सेवा संस्थानों के दरवाजे चौबीसों घंटे खुले रहने चाहिए। न्याय तक पहुंच हर व्यक्ति का अधिकार है और इसे सुनिश्चित करना विधिक सेवा संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
जरूरतमंदों तक खुद पहुंचें विधिक सेवा प्राधिकार
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि यदि किसी पीड़ित को अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी नहीं है, वह अशिक्षित है या आर्थिक तंगी के कारण अदालत तक पहुंचने में असमर्थ है, तो उसे केवल कानूनी कार्यालय आने और आवेदन देने की सलाह देना पर्याप्त नहीं होगा। ऐसी स्थिति में विधिक सेवा प्राधिकार को खुद उस व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए और उसकी परेशानी समझकर समाधान की पहल करनी चाहिए।
वकीलों और पारा लीगल स्वयंसेवकों की अहम भूमिका
सीजेआई ने कहा कि जरूरतमंदों को न्याय दिलाने में वकीलों, लीगल एड डिफेंस काउंसिल और पारा लीगल स्वयंसेवकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इन सभी को मिलकर पीड़ितों की समस्याओं को समझना होगा और उन्हें कानूनी सहायता उपलब्ध करानी होगी। न्याय व्यवस्था का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।
स्थानीय भाषा में संवाद से आसान होगी न्याय तक पहुंच
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने विशेष रूप से कहा कि गरीब, आदिवासी और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों से ऐसी भाषा में बातचीत नहीं होनी चाहिए, जिसे वे समझ न सकें। झारखंड जैसे राज्य में स्थानीय भाषाओं का विशेष महत्व है। जरूरतमंदों की बात उनकी अपनी भाषा में सुनने और समझने से न्याय प्रक्रिया के प्रति उनका भरोसा बढ़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषा, शिक्षा और आर्थिक स्थिति किसी भी व्यक्ति के न्याय पाने के अधिकार में बाधा नहीं बननी चाहिए।




