
दुर्गा प्रतिमा में सबसे आखिर में क्यों बनाई जाती हैं मां की आंखें? जानिए ‘चक्षुदान’ का महत्व
शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू हो रही है। दुर्गा पूजा की प्रतिमाओं में आंखों की चित्रकारी को विशेष महत्व दिया जाता है। बंगाल की परंपरा में इस प्रक्रिया को ‘चक्षुदान’ कहते हैं।

रांची। शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। कोलकाता के साथ झारखंड, बिहार, ओडिशा और देश के दूसरे हिस्सों में पंडाल सजाए जाएंगे और मां दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी। इस वर्ष शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर 2026 से शुरू होगी। पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी।
प्रतिमा निर्माण के दौरान मूर्तिकार पहले मां दुर्गा का आकार और चेहरा तैयार करते हैं। रंग और सजावट के बाद आंखों को अंतिम रूप दिया जाता है। देखने में यह चित्रकारी का छोटा हिस्सा लग सकता है, लेकिन प्रतिमा के पूरे भाव में इसकी अहम भूमिका होती है।
आंखें सबसे आखिर में क्यों बनाते हैं?
मां दुर्गा की आंखों की रेखाएं चेहरे पर करुणा, शक्ति और दृढ़ता का भाव उभारती हैं। उन्हें बनाने के लिए हाथ की सफाई और बहुत बारीक काम की जरूरत होती है। इसीलिए कई मूर्तिकार प्रतिमा का बाकी काम पूरा होने के बाद आंखें बनाते हैं। बंगाल की परंपरा में आंखों की इस चित्रकारी को ‘चक्षुदान’ या ‘चोख्खु दान’ कहा जाता है।
रांची के मूर्तिकार प्रदीप पाल के अनुसार, चेहरा तैयार होने के बाद आंखों की रेखाएं और भाव सावधानी से बनाए जाते हैं। वह यह काम स्वयं करते हैं या अनुभवी कलाकारों के साथ मिलकर पूरा करते हैं। उनके लिए यह प्रतिमा निर्माण का ऐसा चरण है, जिसमें कौशल के साथ एकाग्रता भी जरूरी होती है।
महालया से क्या संबंध है?
बंगाल में चक्षुदान की परंपरा को महालया से जोड़ा जाता है। महालया देवी पक्ष के आरंभ से जुड़ा अवसर है और दुर्गा पूजा की तैयारियों में इसका विशेष स्थान है। कई स्थानों पर इसी अवसर पर प्रतिमा की आंखों को अंतिम रूप दिया जाता है। हालांकि, हर मूर्तिकार और पूजा समिति की कार्यप्रणाली एक जैसी हो, यह जरूरी नहीं है।
क्या आंखें बनते ही प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा हो जाती है?
चक्षुदान और प्राण-प्रतिष्ठा अलग प्रक्रियाएं हैं। चक्षुदान प्रतिमा की आंखें बनाने से जुड़ी कलात्मक और पारंपरिक प्रक्रिया है। वहीं, प्राण-प्रतिष्ठा पूजा के निर्धारित विधि-विधान का हिस्सा होती है। इसलिए आंखें बनते ही प्राण-प्रतिष्ठा पूरी हो जाती है, ऐसा कहना सही नहीं होगा।
भक्तों के लिए आंखें पूरी होने का क्षण आस्था से जुड़ा होता है। मां का चेहरा पूर्ण दिखाई देने लगता है और प्रतिमा में वह अभिव्यक्ति उभरती है, जिसे देखने के लिए लोग उत्सुक रहते हैं। यह धार्मिक भावना और कला का अनुभव है; इसे किसी वैज्ञानिक रूप से मापी जाने वाली ऊर्जा के दावे के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
कलाकारों और श्रद्धालुओं के लिए क्यों खास है यह क्षण?
आंखों की चित्रकारी मूर्तिकार के लंबे अभ्यास और पारंपरिक कौशल को सामने लाती है। हर रेखा से प्रतिमा के चेहरे का भाव बदल सकता है। दूसरी ओर, श्रद्धालुओं के लिए यह पूजा की तैयारियों के पूरा होने का भावनात्मक संकेत है।
यही वजह है कि दुर्गा प्रतिमा में आंखें बनाना केवल रंग भरने का अंतिम काम नहीं माना जाता। चक्षुदान में मूर्तिकार की कला, पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और भक्तों की श्रद्धा—तीनों एक साथ दिखाई देते हैं।




