
आज से पितृपक्ष की शुरुआत, 10 अक्टूबर तक होंगे श्राद्ध और तर्पण; जानें किस दिन कौन सा श्राद्ध
27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा पितृपक्ष, तिथि ज्ञात नहीं होने या छूटे श्राद्ध के लिए अमावस्या का दिन रहेगा महत्वपूर्ण

रांची। पितरों को समर्पित पितृपक्ष की शुरुआत रविवार, 27 सितंबर से हो रही है। आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होने वाला यह पक्ष 10 अक्टूबर को अमावस्या के साथ समाप्त होगा। इस दौरान पितरों की आत्मिक शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है।
पंडित कौशल कुमार मिश्र के अनुसार, जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर पितृपक्ष में उसका श्राद्ध किया जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में पितरों का स्मरण करते हुए किए गए धार्मिक कर्मों से उन्हें तृप्ति मिलती है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
27 सितंबर को प्रतिपदा का श्राद्ध
शनिवार रात 10:05 बजे तक पूर्णिमा तिथि रहेगी। इसके बाद प्रतिपदा शुरू होगी। 27 सितंबर को प्रतिपदा तिथि रात 9:20 बजे तक रहेगी। इसी दिन प्रतिपदा का श्राद्ध, तर्पण आदि किया जाएगा।
इस बार पितृपक्ष में नवमी तिथि का क्षय बताया गया है। इसलिए नवमी का श्राद्ध अष्टमी तिथि के दिन, 4 अक्टूबर को सुबह 7:05 बजे के बाद किया जाएगा।
2 अक्टूबर को षष्ठी-सप्तमी, 3 को अष्टमी का श्राद्ध
पितृपक्ष की तिथियों के अनुसार 2 अक्टूबर को षष्ठी और सप्तमी दोनों तिथियां रहेंगी। षष्ठी तिथि दोपहर 12:17 बजे तक रहेगी, इसके बाद सप्तमी शुरू होगी। मध्याह्न काल में सप्तमी तिथि मिलने के कारण इसी दिन सप्तमी का श्राद्ध किया जाएगा।
इसके बाद 3 अक्टूबर को अष्टमी और 4 अक्टूबर को नवमी का श्राद्ध होगा। वहीं 5 अक्टूबर को दशमी, 6 अक्टूबर को एकादशी, 7 अक्टूबर को द्वादशी, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी का श्राद्ध किया जाएगा।
10 अक्टूबर को अमावस्या के साथ पितृपक्ष का समापन
10 अक्टूबर को अमावस्या का श्राद्ध होगा और इसी के साथ पितृपक्ष का समापन हो जाएगा। अमावस्या तिथि रात 8:32 बजे तक रहने की जानकारी दी गई है।
तिथि पता नहीं तो अमावस्या को कर सकते हैं श्राद्ध
जिन लोगों को अपने पितरों की श्राद्ध तिथि की जानकारी नहीं है, उनके लिए अमावस्या का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है। किसी कारण से श्राद्ध या तर्पण छूट जाने पर भी अमावस्या के दिन यह कर्म किया जा सकता है।
भाद्रपद पूर्णिमा को मातामह श्राद्ध की भी परंपरा है। कई जगहों पर इसी दिन से तर्पण शुरू करने की परंपरा है, खासकर गया और गंगा नदी के तट पर।
पितृपक्ष में शुभ कार्यों से परहेज
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान विवाह, गृह प्रवेश समेत अन्य शुभ कार्य नहीं किए जाते। इस अवधि को पितरों के स्मरण, श्राद्ध और तर्पण के लिए समर्पित माना जाता है।
घर पर भी किया जा सकता है तर्पण
श्राद्ध और तर्पण के लिए नदी, तालाब, मंदिर, डैम या अन्य जलस्रोतों के किनारे जाने की परंपरा है। हालांकि इसे घर की छत, घर के बाहर या मंदिर परिसर में भी किया जा सकता है।
स्नान के बाद जल में तिल और जौ आदि मिलाकर कुश के साथ तर्पण किया जाता है। यह कर्म स्वयं या पंडित के माध्यम से किया जा सकता है।
पितृपक्ष के दौरान किसी एक दिन ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराने और अपनी क्षमता के अनुसार दान देने की भी परंपरा है। ऐसा संभव नहीं होने पर मंदिर या गौशाला में दान किया जा सकता है। इसके अलावा गाय, कौआ, कुत्ता और चींटी आदि को भोजन कराने की परंपरा भी बताई गई है।




