
हीरे के झुमके ठुकराकर मांगा था इनसाइक्लोपीडिया, भारत की ‘वेदर वुमन’ अन्ना मणि ने मौसम विज्ञान में रचा इतिहास
महज 12 साल की उम्र में पढ़ डालीं लाइब्रेरी की सैकड़ों किताबें, आगे चलकर करीब 100 मौसम उपकरणों को किया डिजाइन; ओजोन रिसर्च में भी दिया अहम योगदान

रांची: आजादी के शुरुआती दौर में जब महिलाओं के लिए पढ़ाई और करियर के मौके बेहद सीमित थे, उसी समय एक ऐसी महिला सामने आईं, जिन्होंने अपनी मेहनत और वैज्ञानिक सोच से अलग पहचान बनाई। नाम था अन्ना मणि, जिन्हें आगे चलकर ‘वेदर वुमन ऑफ इंडिया’ के नाम से जाना गया।
23 अगस्त 1918 को केरल के तिरुवनंतपुरम में जन्मीं अन्ना मणि अपने परिवार की आठ संतानों में सातवीं थीं। उनके पिता सिविल इंजीनियर थे और परिवार के पास इलायची के बागान भी थे। उस समय भारत में महिलाओं की साक्षरता बेहद कम थी, लेकिन अन्ना मणि को बचपन से ही पढ़ने का जबरदस्त शौक था।
कहा जाता है कि महज 12 साल की उम्र में उन्होंने एक सार्वजनिक पुस्तकालय में मौजूद मलयालम की लगभग सभी किताबें पढ़ डाली थीं।
हीरे के झुमके नहीं, मांगा था इनसाइक्लोपीडिया
अन्ना मणि की पढ़ाई के प्रति लगन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके आठवें जन्मदिन पर पिता ने उन्हें हीरे के झुमके दिए। लेकिन अन्ना ने यह तोहफा लेने से इनकार कर दिया और इसके बदले इनसाइक्लोपीडिया यानी विश्वकोष का सेट मांगा।
वैज्ञानिक सोच की नींव उनके घर में ही पड़ चुकी थी। उनके पिता बच्चों को सिखाते थे कि किसी भी बात को बिना जांचे-परखे सच नहीं मानना चाहिए। यही सोच आगे चलकर अन्ना मणि के वैज्ञानिक जीवन का आधार बनी।
भौतिकी पढ़ना चाहती थीं, किस्मत ने मौसम विज्ञान से जोड़ दिया
ग्रेजुएशन के बाद साल 1940 में अन्ना मणि को भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर में भौतिकी में रिसर्च के लिए स्कॉलरशिप मिली। यहां उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता सी.वी. रमन के साथ माणिक और हीरे की स्पेक्ट्रोमेट्री पर काम किया।
उनके शोध के आधार पर पांच रिसर्च पेपर और एक Ph.D. शोध प्रकाशित हुआ। हालांकि, मास्टर डिग्री नहीं होने की वजह से उन्हें Ph.D. नहीं दी गई।
इसके बाद उन्हें लंदन में भौतिकी की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कॉलरशिप मिली। लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें मेट्रोलॉजिकल इंस्ट्रूमेंटेशन में इंटर्नशिप का मौका मिला। यही संयोग आगे चलकर उनके पूरे करियर की दिशा बदलने वाला साबित हुआ।
आजादी के बाद भारत लौटकर मौसम विभाग से जुड़ीं
1948 में भारत लौटने के बाद अन्ना मणि ने भारतीय मौसम विभाग ज्वॉइन किया। यहां उन्होंने मौसम से जुड़े उपकरणों पर काम शुरू किया। उनका मकसद भारत को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में योगदान देना था।
समय के साथ वह मौसम विभाग में उप महानिदेशक के पद तक पहुंचीं। अपनी टीम के साथ उन्होंने करीब 100 मौसम संबंधी उपकरणों को डिजाइन किया और बाद में उनके उत्पादन की दिशा में भी काम किया।
ओजोन परत पर भी किया अहम काम
अन्ना मणि के शोध का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र ओजोन भी था। उन्होंने ओजोनसॉन्ड नाम का उपकरण विकसित किया, जिसकी मदद से वायुमंडल में ओजोन की सटीक माप करने में मदद मिली।
उनके काम से यह समझने में भी मदद मिली कि अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों और वायु प्रदूषण के आधार पर ओजोन की मोटाई में अंतर हो सकता है। पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा में ओजोन परत की भूमिका को लेकर उनका काम अपने समय में काफी महत्वपूर्ण माना गया।
महिला होने को कभी अपनी सीमा नहीं बनने दिया
अन्ना मणि ने अपने करियर के साथ-साथ निजी जीवन को लेकर भी अपने फैसले खुद लिए। उन्होंने शादी नहीं करने का विकल्प चुना और अपना पूरा ध्यान शिक्षा, शोध और वैज्ञानिक कार्यों पर लगाया।
वह पुरुषों और महिलाओं को बौद्धिक क्षमता के मामले में समान मानती थीं। उनका कहना था कि उन्होंने जिंदगी में जो फैसले लिए, उन पर उनके महिला होने का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
2001 में करीब 83 वर्ष की उम्र में स्ट्रोक के बाद अन्ना मणि का निधन हो गया। लेकिन मौसम विज्ञान, मौसम उपकरणों और ओजोन रिसर्च में उनका योगदान आज भी भारतीय विज्ञान के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।




