रिपोर्ट में धार्मिक-जातीय विवादों को समय रहते रोकने की दी गई थी सलाह; 2020 से 2024 के बीच 25 घटनाओं का जिक्र, सुनसरी में हालिया हिंसा के बाद फिर उठे सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

Nepal Terai-Madhes Violence: नेपाल के तराई-मधेस क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव को लेकर एक पुरानी सुरक्षा रिपोर्ट एक बार फिर चर्चा में है। नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेपाल की Armed Police Force (APF) ने करीब तीन साल पहले सरकार को एक गोपनीय रिपोर्ट सौंपकर तराई-मधेस में बढ़ते धार्मिक और जातीय तनाव को लेकर आगाह किया था।
रिपोर्ट में कथित तौर पर चेतावनी दी गई थी कि कुछ तत्व धार्मिक और जातीय विवादों को हवा देकर सामाजिक तनाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हाल में भारत की सीमा से सटे सुनसरी जिले में हुई सांप्रदायिक हिंसा और एक हिंदू व्यक्ति की मौत के बाद इस पुरानी रिपोर्ट को लेकर नेपाल में बहस तेज हो गई है।
सुनसरी की हिंसा के बाद फिर चर्चा में पुरानी रिपोर्ट
26 जुलाई को सुनसरी जिले में हुई सांप्रदायिक झड़प में एक हिंदू व्यक्ति की मौत की खबर सामने आई। हिंसा में सुरक्षाकर्मियों समेत कई अन्य लोगों के घायल होने की भी जानकारी दी गई। स्थिति बिगड़ने के बाद स्थानीय प्रशासन ने प्रभावित इलाकों के कुछ हिस्सों में प्रतिबंधात्मक आदेश लागू किए। इसी घटना के बाद नेपाली अखबार कांतिपुर की एक रिपोर्ट चर्चा में आई, जिसमें दावा किया गया कि सुरक्षा एजेंसियों ने इस तरह के तनाव को लेकर सरकार को पहले ही सतर्क किया था।
APF ने सरकार को क्या चेतावनी दी थी?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, APF की रिपोर्ट में कहा गया था कि तराई-मधेस में कुछ ऐसे तत्व सक्रिय हैं जो धर्म और जातीय पहचान से जुड़े विवादों को भड़काकर सामाजिक सौहार्द प्रभावित कर सकते हैं। रिपोर्ट में ऐसे संगठनों और उनकी गतिविधियों की निगरानी तथा जरूरत पड़ने पर उन्हें रेगुलेट करने की सलाह दिए जाने का दावा किया गया है।
कांतिपुर ने APF के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से यह भी दावा किया कि उस समय राजनीतिक नेतृत्व ने सुरक्षा एजेंसी की ब्रीफिंग को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया।
विदेशी और घरेलू NGOs से मदद का भी दावा
रिपोर्ट में कुछ संगठनों को नेपाल और विदेश में सक्रिय गैर-सरकारी संगठनों से सहायता मिलने का दावा भी किया गया था। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और किसी समुदाय विशेष को इसके लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सुरक्षा रिपोर्ट का मुख्य जोर संभावित कट्टरपंथी तत्वों और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाली गतिविधियों की पहचान पर बताया गया है।
भारतीय पक्ष की चेतावनी का दावा
नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार अनिल गिरी ने इस रिपोर्ट को साझा करते हुए दावा किया कि भारतीय अधिकारियों ने भी तराई में बढ़ते धार्मिक तनाव को लेकर नेपाली पक्ष को पहले आगाह किया था। उनके मुताबिक भारतीय अधिकारियों की ओर से यह आशंका जताई जाती थी कि समय रहते स्थिति नहीं संभाली गई तो भविष्य में समस्या और गंभीर हो सकती है।
यह दावा पत्रकार की ओर से साझा किया गया है। भारत सरकार की ओर से ऐसी किसी विशिष्ट चेतावनी का आधिकारिक विवरण इस सामग्री में उपलब्ध नहीं है।
मणिपुर की घटनाओं से सबक लेने की बात
APF की कथित रिपोर्ट में नेपाल को दूसरे देशों और पड़ोसी क्षेत्रों में हुए जातीय एवं धार्मिक संघर्षों से सबक लेने की सलाह भी दी गई थी। रिपोर्ट में भारत के मणिपुर में हुई हिंसा का उदाहरण देते हुए कहा गया था कि जाति, धर्म और भाषा से जुड़े विवादों को शुरुआती स्तर पर ही संभालना जरूरी है, ताकि वे बड़े संघर्ष में न बदलें। हालांकि नेपाल की मौजूदा स्थिति को सीधे मणिपुर जैसी परिस्थिति घोषित करना उपलब्ध जानकारी के आधार पर जल्दबाजी होगी। दोनों जगहों की सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक परिस्थितियां अलग हैं।
2020 से 2024 के बीच 25 घटनाओं का दावा
रिपोर्ट में 2020 से 2024 के बीच धार्मिक और जातीय मुद्दों से जुड़ी 25 घटनाओं का उल्लेख किए जाने की बात कही गई है। इसमें विशेष रूप से रूपंदेही, सर्लाही, धनुषा, बांके, सप्तरी, मोरंग, बर्दिया, कपिलवस्तु, बारा, झापा, महोत्तरी और सुनसरी जैसे जिलों में संवेदनशील परिस्थितियों पर ध्यान देने की बात सामने आई है।
छोटे विवादों को सांप्रदायिक रंग देने की चिंता
APF के पूर्व Additional Inspector General नारायण बाबू थापा के हवाले से बताया गया कि सुरक्षा बल ने कृष्णानगर, नेपालगंज, रौतहट और बीरगंज जैसी जगहों पर हुई पिछली घटनाओं का विश्लेषण किया था।= उनके मुताबिक चिंता का विषय ऐसे मामले थे, जहां सामान्य या स्थानीय विवाद बाद में सांप्रदायिक तनाव का रूप लेने लगे।
तराई में हाल की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
हाल के वर्षों में नेपालगंज, मलंगवा, बीरगंज और सुनसरी समेत तराई के कुछ हिस्सों में धार्मिक तनाव के बाद प्रशासन को कर्फ्यू या प्रतिबंधात्मक कदम उठाने पड़े हैं। इसके साथ ही सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय बदलाव और नए धार्मिक स्थलों, मदरसों तथा बस्तियों के विस्तार को लेकर भी अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। ऐसे दावों को आधिकारिक जनगणना और सत्यापित सरकारी आंकड़ों के संदर्भ में देखना जरूरी है, क्योंकि जनसंख्या में बदलाव को अपने आप सांप्रदायिक हिंसा का कारण मानना उचित नहीं होगा।
सुनसरी की हालिया घटना के बाद फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि नेपाल सरकार और सुरक्षा एजेंसियां तराई-मधेस में धार्मिक एवं जातीय तनाव को बढ़ने से रोकने, अफवाहों पर नियंत्रण और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए आगे क्या कदम उठाती हैं।

