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"पहले युद्ध में राजा बंदी बनते थे, अब चुनाव में नेता?" लोकतंत्र में हारने वाला विरोधी है या युद्धबंदी? पढ़िए अबुआ न्यूज़ झारखंड का विशेष संपादकीय।
Editor's POV

“पहले युद्ध में राजा बंदी बनते थे, अब चुनाव में नेता?”लोकतंत्र में हारने वाला विरोधी है या युद्धबंदी? पढ़िए अबुआ न्यूज़ झारखंड का विशेष संपादकीय।

By Team Abua
June 11, 2026 2 Min Read
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लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहाँ सत्ता स्थायी नहीं होती। जनता कभी किसी को सिंहासन पर बैठाती है तो कभी उसे विपक्ष की कुर्सी पर भेज देती है। चुनाव में जीत और हार लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। आज जो विजेता है, कल वह पराजित भी हो सकता है, और जो आज हारा है, वह कल फिर जनता का विश्वास जीत सकता है।

लेकिन एक सवाल बार-बार मन में उठता है—क्या चुनाव हारने के बाद किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के साथ ऐसा व्यवहार होना चाहिए मानो कोई युद्ध हार गया हो?

पुराने समय में जब दो राज्यों के बीच युद्ध होता था और एक राजा पराजित हो जाता था, तो विजेता राजा उसे बंदी बनाकर अपने दरबार में लाता था। उसके राज्य, उसके सम्मान और उसके प्रभाव को समाप्त करने की कोशिश की जाती थी। इतिहास की किताबें ऐसे अनेक प्रसंगों से भरी हुई हैं।

लेकिन इक्कीसवीं सदी का भारत कोई राजशाही नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।

लोकतंत्र में हारने वाला शत्रु नहीं होता। वह जनता द्वारा चुना गया एक जनप्रतिनिधि होता है। यदि कोई मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, सांसद या विधायक चुनाव हारता है, तो उसकी राजनीतिक जिम्मेदारी बदल सकती है, लेकिन उसका लोकतांत्रिक सम्मान समाप्त नहीं हो जाता।

अक्सर देखा जाता है कि सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ जांच एजेंसियों की सक्रियता बढ़ जाती है, पुराने मामलों की चर्चा होने लगती है और मीडिया में केवल उनकी गलतियों को प्रमुखता मिलने लगती है। यह सच है कि कानून सबके लिए समान होना चाहिए और यदि किसी ने गलती की है तो उसकी जांच भी होनी चाहिए। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि लोकतंत्र केवल जवाबदेही से नहीं, बल्कि गरिमा और संतुलन से भी चलता है।

किसी नेता की आलोचना होनी चाहिए, उसके निर्णयों की समीक्षा होनी चाहिए, लेकिन उसके पूरे राजनीतिक जीवन को केवल आरोपों के चश्मे से देखना भी उचित नहीं कहा जा सकता।

जब कोई नेता सत्ता में होता है, तब उसके समर्थक उसकी उपलब्धियाँ गिनाते हैं। लेकिन जैसे ही वह सत्ता से बाहर होता है, उसके अच्छे कार्यों का जिक्र तक बंद हो जाता है। मानो इतिहास केवल दोषों का लेखा-जोखा बनकर रह गया हो।

लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि हम विरोधी विचारों का सम्मान करना सीखें। मजबूत सरकार जितनी जरूरी है, उतना ही मजबूत विपक्ष भी जरूरी है। सत्ता और विपक्ष लोकतंत्र के दो पहिए हैं। यदि एक पहिया दूसरे को कुचलने की कोशिश करेगा, तो लोकतंत्र की गाड़ी संतुलन खो देगी।

आज भारत को ऐसे राजनीतिक वातावरण की आवश्यकता है जहाँ चुनावी हार को राजनीतिक मृत्यु न माना जाए और चुनावी जीत को पूर्ण सत्ता का लाइसेंस न समझा जाए।

क्योंकि लोकतंत्र में राजा नहीं होते, नागरिक होते हैं।

और लोकतंत्र की असली जीत तब होती है, जब हारने वाले का सम्मान भी सुरक्षित रहे।

    Tags:

    #Democracy#IndiaPolitics#Opposition#PoliticalAnalysis#PoliticalDebate
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    Team Abua

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