नई दिल्ली: भारत के न्यायिक इतिऱास में एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बुधवार (11 मार्च 2026) को पहली बार एक व्यक्ति के लिए ‘इच्छा मृत्यु’ (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी । यह Supreme Court Euthanasia Permission भारत के कानूनी इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा।
कोर्ट ने 32 वर्षीय हरीश राणा (Harish Rana), जो पिछले 13 साल से कोमा में लाइफ़ सपोर्ट पर थे, उनकी जीवनरक्षक मशीनें हटाने की मंज़ूरी दी है । यह फैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया । आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक Supreme Court Euthanasia Permission से जुड़ी हर अहम बात और इसके दूरगामी परिणाम।
Supreme Court Euthanasia Permission: 2013 में हुआ था गंभीर हादसा

Supreme Court Euthanasia Permission के इस मामले की शुरुआत 2013 में हुए एक दर्दनाक हादसे से हुई।
हरीश राणा की दुर्घटना
जानकारी के मुताबिक, अगस्त 2013 में चंडीगढ़ में एक इमारत की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद हरीश राणा गंभीर रूप से घायल हो गए थे । इसके बाद से वे लगातार कोमा में थे और दिल्ली के एम्स अस्पताल (AIIMS Delhi) में लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम पर रखे गए थे ।
13 साल का लंबा इंतजार
हरीश के परिवार ने 13 साल तक उनके ठीक होने की उम्मीद लगाए रखी, लेकिन डॉक्टरों ने कोई सुधार नहीं बताया। अंत में, उनके पिता अशोक राणा ने बेटे की पीड़ा को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में इच्छा मृत्यु की याचिका दायर की।
Supreme Court Euthanasia Permission: कोर्ट ने क्या कहा?
Supreme Court Euthanasia Permission पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणियां कीं।
मरीज की गरिमा का अधिकार
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मरीज की गरिमा (Dignity) का अधिकार उसके जीवन के अधिकार का ही एक हिस्सा है। जब जीवन को बनाए रखना ही पीड़ा का कारण बन जाए, तो उसे समाप्त करने का अधिकार भी मरीज को है।
एम्स को दी गई विशेष प्रक्रिया बनाने की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एम्स-दिल्ली को निर्देश दिया है कि लाइफ़ सपोर्ट हटाने के लिए एक विस्तृत और संवेदनशील योजना तैयार की जाए, ताकि पूरी प्रक्रिया के दौरान मरीज़ की गरिमा और सम्मान बना रहे ।
Supreme Court Euthanasia Permission: केंद्र सरकार को कानून बनाने की सलाह
Supreme Court Euthanasia Permission के इस मामले को सुनते हुए अदालत ने एक और महत्वपूर्ण सिफारिश की।
व्यापक कानून की आवश्यकता
इस मामले को सुनते हुए अदालत ने केंद्र सरकार से ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (Passive Euthanasia) को लेकर व्यापक कानून बनाने पर भी विचार करने को कहा है, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया उपलब्ध हो सके । अभी तक यह मामला सुप्रीम कोर्ट की 2018 की संविधान पीठ के फैसले पर आधारित है।
Supreme Court Euthanasia Permission: पिता ने फैसले का किया स्वागत
Supreme Court Euthanasia Permission का हरीश राणा के परिवार ने स्वागत किया है।
अशोक राणा का बयान
हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि वे मानवीय दृष्टिकोण से दिए गए इस निर्णय के लिए अदालत के आभारी हैं । उन्होंने कहा कि यह फैसला उनके बेटे की लंबे समय से चल रही पीड़ा को सम्मानजनक तरीके से समाप्त करने का मार्ग खोलता है ।
पीड़ा से मुक्ति
परिवार का कहना था कि हरीश को देखकर उन्हें हर दिन पीड़ा होती थी। अब उन्हें शांति मिलेगी कि उनका बेटा अब इस यातना से मुक्त हो जाएगा।
Supreme Court Euthanasia Permission: भारत में इच्छा मृत्यु पर बहस फिर तेज
Supreme Court Euthanasia Permission के बाद देश में इच्छा मृत्यु (Euthanasia) और मरीज़ की गरिमा के अधिकार को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में गंभीर रूप से बीमार और असाध्य स्थिति में पड़े मरीजों के अधिकारों को लेकर नई दिशा तय कर सकता है । यह फैसला मरीज की स्वायत्तता (Patient Autonomy) और गरिमा के अधिकार को मजबूती प्रदान करता है।
भारत में इच्छा मृत्यु का इतिहास
- 2011 में, सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग मामले में पैसिव इच्छा मृत्यु की अनुमति दी थी, लेकिन यह एक विशिष्ट मामला था।
- 2018 में, सुप्रीम कोर्ट की 5-जजों की संविधान पीठ ने पैसिव इच्छा मृत्यु को कानूनी मान्यता दी और इसके लिए दिशा-निर्देश जारी किए।
- अब 2026 का यह फैसला उसी दिशा में एक और कदम है, जहां कोर्ट ने व्यक्तिगत मामले में अनुमति दी है।
Supreme Court Euthanasia Permission: क्या होती है इच्छा मृत्यु?
Supreme Court Euthanasia Permission के संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि इच्छा मृत्यु क्या होती है।
- एक्टिव इच्छा मृत्यु (Active Euthanasia): इसमें मरीज को सक्रिय रूप से जानलेवा दवा या इंजेक्शन देकर मार दिया जाता है। भारत में यह अवैध है।
- पैसिव इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia): इसमें मरीज को जीवित रखने वाली मशीनें या दवाएं हटा दी जाती हैं, जिससे मरीज की प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे कानूनी मान्यता दी है।
Supreme Court Euthanasia Permission: निष्कर्ष
Supreme Court Euthanasia Permission ने भारत के कानूनी इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। 13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा के मामले में यह फैसला न सिर्फ उनके परिवार के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह देश में इच्छा मृत्यु को लेकर चल रही बहस को भी एक नई दिशा देगा । यह फैसला मरीज की गरिमा और उसके अधिकारों के प्रति अदालत की संवेदनशीलता को दर्शाता है। अब सरकार को इस दिशा में एक व्यापक कानून बनाने पर विचार करना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह के मामलों में स्पष्ट प्रक्रिया उपलब्ध हो सके।
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