SI Asmita Dey भारत की महिला जूडो खिलाड़ी और उत्तर प्रदेश पुलिस में तैनात सब-इंस्पेक्टर (SI) अस्मिता डे ने अंतरराष्टीय मंच पर इतिहास रच दिया है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ जूडो चैंपियनशिप में उन्होंने महिला 48 किलोग्राम भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया । इस उपलब्धि के साथ अस्मिता डे कॉमनवेल्थ जूडो के इतिहास में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं ।
फाइनल में कनाडा की खिलाड़ी को हराया
स्वर्ण पदक मुकाबले में अस्मिता डे का सामना कनाडा की हाइडी क्वाच से हुआ । दोनों खिलाड़ियों के बीच मुकाबला बेहद रोमांचक रहा। अस्मिता ने शुरुआत में एक युको (यूको) गंवाया और एक शिडो (पेनल्टी) भी मिली, जिससे क्वाच ने बढ़त बना ली । लेकिन अस्मिता ने धैर्य नहीं खोया और मध्यांतर तक आक्रामक रणनीति अपनाते हुए स्कोर 1-1 से बराबर कर लिया ।
निर्धारित समय तक कोई स्पष्ट विजेता नहीं निकलने पर मैच गोल्डन स्कोर (सडन-डेथ अतिरिक्त समय) तक पहुंचा । निर्णायक क्षणों में अस्मिता ने शानदार प्रदर्शन करते हुए एक युको स्कोर किया और ऐतिहासिक जीत दर्ज की ।
पूरे टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन
अस्मिता डे ने पूरे टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन किया:
प्री-क्वार्टर फाइनल में जीत दर्ज की ,
क्वार्टर फाइनल में स्कॉटलैंड की ईवा यूइंग को इप्पन से हराया ,
सेमीफाइनल में स्कॉटलैंड की ही समर शॉ को युको से हराकर फाइनल में जगह बनाई ,
और फिर फाइनल में कनाडा की हाइडी क्वाच को हराकर गोल्ड अपने नाम किया ।
दारोगा और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दोनों जिम्मेदारियां निभा रहीं
अस्मिता डे फिलहाल गाजियाबाद पुलिस लाइन में तैनात हैं। इसी वर्ष मार्च 2026 में उन्हें दारोगा (सब-इंस्पेक्टर) के पद पर पदोन्नत किया गया था । उन्होंने 2023 में उत्तर प्रदेश पुलिस में स्पोर्ट्स कोटा के तहत भर्ती होकर सेवा शुरू की थी ।
पिता की मौत के बाद संघर्ष की कहानी
अस्मिता डे की यह जीत संघर्ष और बलिदान की कहानी है । उनके पिता अर्जुन कुमार डे एक साइकिल मैकेनिक थे, जो रोजाना महज 300 रुपये कमाते थे । दिसंबर 2025 में उनके पिता का ब्रेन स्ट्रोक से निधन हो गया ।
अपनी जीत के बाद अस्मिता ने कहा:
“जब मेरे पापा का निधन हुआ, तो मुझे लगा कि सब कुछ खत्म हो गया क्योंकि वही मेरे सबसे बड़े सपोर्टर थे। लेकिन मेरी मां ने मुझे वापस लौटने के लिए कहा और कहा कि अगर मैंने तुम्हें रोक दिया तो तुम्हारे पापा सोचेंगे कि मैंने उनके सपनों को तोड़ दिया” ।
भारतीय जूडो के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि
अस्मिता डे की यह जीत भारतीय जूडो के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ती है । कॉमनवेल्थ खेलों में 1990 में जूडो को शामिल किए जाने के बाद से भारत को 11 पदक (5 रजत, 6 कांस्य) मिले थे, लेकिन स्वर्ण कभी नहीं । अस्मिता ने इस 36 साल की बाधा को तोड़ा ।
देशभर में खुशी की लहर
अस्मिता डे की इस उपलब्धि पर खेल जगत, पुलिस विभाग और देशभर से उन्हें बधाइयां मिल रही हैं । मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें बधाई देते हुए इसे “मां भारती के लिए गौरव” बताया ।
उत्तर प्रदेश पुलिस ने अस्मिता डे को हर संभव लॉजिस्टिक और ट्रेनिंग सहायता प्रदान की, जिसमें स्पोर्ट्स किट, जूते, पोषण सप्लीमेंट और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं शामिल थीं । अब उन्हें उत्तर प्रदेश की स्पोर्ट्स पॉलिसी के तहत डीएसपी पद पर पदोन्नति मिल सकती है ।
ग्लासगो से आया यह स्वर्ण पदक केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि भारतीय जूडो के बढ़ते वैश्विक दबदबे और देश की खेल प्रतिभा का प्रतीक बन गया है ।
बाहरी संसाधन
- कॉमनवेल्थ खेलों की आधिकारिक वेबसाइट: https://www.commonwealthsport.com
- इंटरनेशनल जूडो फेडरेशन: https://www.ijf.org
- उत्तर प्रदेश पुलिस: https://uppolice.gov.in


