
अबुआ न्यूज़ झारखंड | Truth News Analysis
भारतीय रुपया एक बार फिर चर्चा में है। देश की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जा रही है, लेकिन इसके बावजूद भारतीय मुद्रा लगातार कमजोर होती जा रही है। सवाल यह है कि जब भारत की जीडीपी वृद्धि दर कई बड़े देशों से बेहतर है, तो फिर रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होने के बजाय लगातार गिर क्यों रहा है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मई 2014 में जब पहली बार देश की कमान संभाली थी, तब एक अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 59 रुपये थी। जून 2026 में यह आंकड़ा करीब 96 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच चुका है। यानी पिछले 12 वर्षों में रुपये की कीमत में 60 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है।
हालांकि यह भी सच है कि रुपये की कमजोरी केवल मौजूदा सरकार तक सीमित नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भी रुपया लगातार कमजोर हुआ था। लेकिन वर्तमान समय में चिंता इस बात को लेकर है कि तेज आर्थिक विकास के बावजूद रुपया अपेक्षित मजबूती नहीं दिखा पा रहा।
आखिर रुपया कमजोर क्यों हो रहा है?
अर्थशास्त्रियों के अनुसार किसी भी देश की मुद्रा की मजबूती केवल उसकी आर्थिक विकास दर पर निर्भर नहीं करती। विदेशी निवेश, व्यापार संतुलन, आयात-निर्यात, विदेशी मुद्रा भंडार, भू-राजनीतिक परिस्थितियां और वैश्विक निवेशकों का भरोसा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पिछले दो वर्षों में भारत को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर बढ़ाए गए आयात शुल्क, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ऊर्जा संकट ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ाया। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर रुपये पर पड़ता है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने रुपये को संभालने के लिए कई बार बाजार में हस्तक्षेप किया, लेकिन इसके बावजूद डॉलर की मांग लगातार बनी रही और रुपया कमजोर होता गया।
पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम का मानना है कि रुपये की कमजोरी केवल हालिया भू-राजनीतिक संकटों का परिणाम नहीं है। उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों में भारतीय मुद्रा पर लगातार दबाव बना हुआ है और यह एक व्यापक आर्थिक चुनौती का संकेत है।
जब रुपया गिर रहा है तो एशिया की कई मुद्राएं क्यों मजबूत हो रही हैं?
दिलचस्प बात यह है कि भारत के साथ-साथ कई एशियाई अर्थव्यवस्थाएं भी वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रही हैं, लेकिन उनकी मुद्राएं अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई हैं।
मलेशिया की रिंगिट
मलेशिया की मुद्रा रिंगिट पिछले वर्ष एशिया की सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रही। विशेषज्ञ इसके पीछे मजबूत विदेशी निवेश, करंट अकाउंट सरप्लस और लगभग पांच प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर को प्रमुख कारण मानते हैं।
मलेशिया में विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ा है। सरकार की औद्योगिक नीतियों, विशेष आर्थिक क्षेत्रों के विस्तार और चीन, यूरोप तथा मध्य-पूर्व के साथ बढ़ते व्यापारिक संबंधों ने स्थानीय मुद्रा को मजबूती प्रदान की है।
थाईलैंड का बाट
थाईलैंड की मुद्रा बाट ने भी पिछले एक वर्ष में उल्लेखनीय मजबूती दिखाई है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण देश का बढ़ता व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) माना जा रहा है।
विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में बढ़ोतरी ने थाईलैंड को विदेशी मुद्रा अर्जित करने में मदद की है। इससे डॉलर के मुकाबले बाट की स्थिति मजबूत हुई है।
चीन का युआन
चीन की मुद्रा युआन भी हाल के वर्षों के सबसे मजबूत स्तरों के करीब पहुंच गई है। हालांकि अमेरिका और यूरोप लंबे समय से चीन पर अपनी मुद्रा को कृत्रिम रूप से कमजोर रखने का आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन हाल के महीनों में युआन में मजबूती देखने को मिली है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का विशाल निर्यात नेटवर्क और मजबूत व्यापार अधिशेष इसकी प्रमुख वजह है।
सिंगापुर डॉलर
सिंगापुर की अर्थव्यवस्था को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाई-टेक उद्योगों से बड़ा लाभ मिला है। देश के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में तेज वृद्धि हुई है, जिसके कारण सिंगापुर डॉलर भी मजबूत हुआ है।
सिंगापुर की जीडीपी वृद्धि और निर्यात प्रदर्शन ने वैश्विक निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है।
पाकिस्तान का रुपया भी अपेक्षाकृत स्थिर
आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान का रुपया भी पिछले कुछ महीनों में अपेक्षाकृत स्थिर रहा है। विशेषज्ञ इसके पीछे करंट अकाउंट सरप्लस, विदेशी सहायता और प्रवासी पाकिस्तानियों द्वारा भेजी जा रही रकम को प्रमुख कारण मानते हैं।
हालांकि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह मजबूती घरेलू आर्थिक सुधारों की तुलना में बाहरी समर्थन पर अधिक आधारित है।
आम लोगों पर क्या असर पड़ता है?
रुपये की कमजोरी का सबसे सीधा असर आम नागरिकों की जेब पर पड़ता है।
जब रुपया गिरता है तो कच्चा तेल, एलपीजी, उर्वरक, इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण और कई अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। इससे महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है।
इसके अलावा विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार का आकर्षण कम हो सकता है, जिससे शेयर बाजार पर भी दबाव पड़ता है।
हालांकि इसका एक सकारात्मक पक्ष भी है। कमजोर रुपया भारतीय निर्यातकों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है क्योंकि भारतीय उत्पाद विदेशी बाजारों में अपेक्षाकृत सस्ते हो जाते हैं। विदेशों में काम कर रहे भारतीयों द्वारा भेजी गई रकम का मूल्य भी रुपये में अधिक मिलता है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की मजबूती केवल केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से संभव नहीं है। इसके लिए निर्यात बढ़ाने, विदेशी निवेश आकर्षित करने, व्यापार घाटा कम करने और ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने जैसे दीर्घकालिक कदमों की आवश्यकता होगी।
भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। लेकिन रुपये की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि आर्थिक विकास के साथ-साथ मुद्रा की स्थिरता बनाए रखना भी आने वाले वर्षों की बड़ी चुनौती होगी।


