
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी, 2026 का एल नीनो दशकों में सबसे शक्तिशाली साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और एल नीनो का संयुक्त प्रभाव दुनिया भर के मौसम और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
अबुआ न्यूज़ झारखंड | Editor Desk
दुनिया एक बार फिर एक बड़े जलवायु संकट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में विकसित होने वाला एल नीनो (El Niño) पिछले कई दशकों के सबसे शक्तिशाली एल नीनो घटनाक्रमों में से एक हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि मौजूदा संकेत सही साबित होते हैं, तो इसका असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कृषि, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों, ऊर्जा खपत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिलेगा।
विशेष चिंता की बात यह है कि यह एल नीनो ऐसे समय में विकसित हो रहा है जब पृथ्वी पहले से ही मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण रिकॉर्ड स्तर की गर्मी झेल रही है। ऐसे में प्राकृतिक जलवायु घटना और ग्लोबल वार्मिंग का संयुक्त प्रभाव दुनिया भर में चरम मौसमीय घटनाओं को जन्म दे सकता है।
आखिर क्या है एल नीनो?
एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है, जो प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने पर विकसित होता है। यह समुद्री तापमान में बदलाव दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हवा और वर्षा के पैटर्न को प्रभावित करता है।
सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग में गर्म पानी जमा रहता है, लेकिन एल नीनो के दौरान यह गर्म पानी पूर्व की ओर खिसक जाता है। इससे वैश्विक मौसम प्रणाली प्रभावित होती है और कई देशों में सूखा, बाढ़, हीटवेव तथा असामान्य वर्षा जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह चेतावनी?
भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। इतिहास बताता है कि कई बार मजबूत एल नीनो वर्षों में भारत को सामान्य से कम बारिश का सामना करना पड़ा है। हालांकि हर एल नीनो का प्रभाव समान नहीं होता, लेकिन मौसम वैज्ञानिक इसे भारतीय मानसून के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक मानते हैं।
यदि 2026 का एल नीनो अनुमान के अनुसार मजबूत होता है, तो भारत में कई प्रकार की चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
सबसे पहला असर गर्मी पर देखने को मिल सकता है। देश के कई हिस्सों में पहले से ही रिकॉर्ड तोड़ तापमान दर्ज किए जा रहे हैं। एल नीनो की स्थिति में हीटवेव की अवधि और तीव्रता दोनों बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर आम लोगों के स्वास्थ्य, बिजली की मांग और जल उपलब्धता पर पड़ेगा।
दूसरा बड़ा असर मानसून पर पड़ सकता है। कमजोर या असमान मानसून से धान, दाल, सब्जियों और अन्य फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे किसानों की आय पर दबाव बढ़ेगा और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।
महंगाई और अर्थव्यवस्था पर भी असर
एल नीनो केवल मौसम की घटना नहीं है, बल्कि इसका आर्थिक प्रभाव भी काफी बड़ा हो सकता है। यदि बारिश कम होती है और फसल उत्पादन प्रभावित होता है, तो खाद्यान्न, फल, सब्जियां और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।
भारत जैसे देश में जहां बड़ी आबादी कृषि और उससे जुड़े व्यवसायों पर निर्भर है, वहां कमजोर मानसून का असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। जल संकट बढ़ने की स्थिति में उद्योगों और बिजली उत्पादन पर भी दबाव बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एल नीनो लंबे समय तक प्रभावी रहता है, तो इसका असर वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भी देखने को मिल सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी और आर्थिक अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
वैज्ञानिक क्यों हैं चिंतित?
अमेरिका के जलवायु वैज्ञानिक ज़ीक हाउसफादर का कहना है कि दुनिया अब उस दौर में पहुंच चुकी है जहां पहले जितनी गर्मी पैदा करने वाली घटनाएं आज कहीं अधिक गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं। उनका मानना है कि यदि 1998 जैसा शक्तिशाली एल नीनो आज की परिस्थितियों में दोबारा आता है, तो उसका प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 2027 वैश्विक स्तर पर अब तक का सबसे गर्म वर्ष बन सकता है। इसका कारण केवल एल नीनो नहीं, बल्कि लगातार बढ़ता मानवजनित कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग भी है।
यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र ने देशों को पहले से तैयारी करने की सलाह दी है। मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों को मजबूत करने, जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन, कृषि क्षेत्र में अनुकूलन रणनीतियां अपनाने और आपदा प्रबंधन तंत्र को सक्रिय रखने पर जोर दिया जा रहा है।
भारत को क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को संभावित एल नीनो के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए वैकल्पिक योजनाएं और किसानों को समय पर मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना बेहद जरूरी होगा।
साथ ही आम नागरिकों को भी गर्मी और जल संकट जैसी संभावित चुनौतियों के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
एल नीनो कोई नई घटना नहीं है, लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग हैं। पृथ्वी पहले से अधिक गर्म है, मौसम पहले से अधिक अनिश्चित है और चरम जलवायु घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में यदि एक शक्तिशाली एल नीनो विकसित होता है, तो उसका प्रभाव दुनिया के साथ-साथ भारत पर भी व्यापक रूप से महसूस किया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की यह चेतावनी केवल वैज्ञानिक रिपोर्ट नहीं, बल्कि भविष्य की संभावित चुनौतियों के प्रति एक गंभीर संकेत है। आने वाले महीनों में मौसम वैज्ञानिकों की निगाहें प्रशांत महासागर पर टिकी रहेंगी, जबकि भारत सहित दुनिया के कई देशों को संभावित प्रभावों के लिए तैयार रहना होगा।



